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गुणी संतान की प्राप्ति का सोपान - : गर्भधारण संस्कार

व्यक्तित्व के विकाश से संस्कृति एवं सभ्यता का विकाश होता है । इन सबका आरंभ संस्कारोँ से होता है । संस्कारोँ की प्रक्रिया जन्म से पूर्व ही शुरू हो जाती है । संतान वीर , साहसी , हिम्मतगर , पवित्र एवं सर्वथा उन्नति-शील हो उसके लिए प्रथम संस्कार गर्भा धारण संस्कार का विशेष महत्व है । माता के गर्भ मेँ बीज के रूप मेँ शिशु का प्रतिष्ठान होना गर्भाधारण संस्कार है । इस संस्कार के पालन से गर्भदोष निवारण , क्षेत्रमार्जन तथा वीर्य सम्बन्धित विकार दूर होता है । स्त्री के गर्भाशय से स्वभाव से ही आर्तव या रजः का स्राव हुआ करता । आर्तव स्राव के प्रथम दिन से सोलहवेँ दिन तक ऋतुकाल कहा जाता है । रजस्वला स्त्रियोँ के लिए शास्त्रोँ मेँ विशिष्ट नियम प्रतिपादित है । उनकी अवहेलना मेँ गर्भ मेँ दोष विकार आ जाते हैँ । रजस्वला स्त्री के चौथे दिन शुद्ध होने पर स्नान के बाद नया वस्त्र एवं सुन्दर आभुषण पहनकर पति के दर्शन करने चाहिए । ऋतु स्नान के उपरान्त स्त्री जिस प्रकार के पुरुष को देखती है , उसी प्रकार के पुरुष के समान पुत्र उत्पन्न करती है । अष्टमी , एकादशी , त्रयोदशी , वनक्षेत्रोँ मेँ मध्या रेवती , मूल तथा मासोँ मेँ कर्क राशी मेँ सुर्य के रहते हुए स्त्री गमन वर्जित है । संध्याकाल मेँ गर्भाधारण करने से अशुभ संतान उत्पन्न होते है । कुम्भकर्ण , हिरण्यकश्यप , हिरण्याक्ष , रावण आदि दुष्टोँ की उत्पत्ति संध्याकाल मेँ गर्भाधारण के कारण ही हुई थी । अशुभ रीति से गर्भाधारण से अशुभ संतान उत्पन्न होती है । अपने माता-पिता के समान गोत्र तथा पिण्डावाली कन्या से विवाह नहीँ करना चाहिए । अनिन्दिय विवाह से अनिन्दिय संतान उत्पन्न होती है । जिस भाव से योनी मेँ वीर्य डाला जाता है , उसी भाव से संतान उत्पन्न होते है । रजस्वला स्त्री के साथ गमन करने से बचना चाहिए । चरक-संहिता मेँ इसे अलक्ष्मीकारक कहा है । पुरुष की बुद्धि , तेज , बल , चक्षु व आयु का नाश रजस्वलागामी होने से होता है । गर्भधारण संस्कार का स्वरूप देवमूर्तियोँ के प्रतिष्ठान की भांति आधि-दैविक है । चैतन्य का अधिष्ठान मानव शरीर देवायतन है । मंदीर मेँ देवता के प्रतिष्ठातन के लिए जिस प्रकार मंत्रोँ से शुद्धि की जाती है , उसी प्रकार के अनुष्ठान द्वारा गर्भाधान संस्कार मेँ जीव मेँ जैतन्य रूपिणी महती शक्ति के प्रतिष्ठापन की योग्यता उत्पन्न की जाती है । गर्भाधारण संस्कार मेँ जीव मेँ चैतन्य रूपिणी महतीशक्ति के प्रतिष्ठापन की योग्यता उत्पन्न हो जाती है । मानव शुलभ दोषोँ के परिहार के लिए जिस प्रकार देवमूर्तियोँ का संस्कार निहित है उसी प्रकार जीव को संस्कार के द्वारा निर्दोँष तथा समाज मेँ उत्कृष्ट बनाया जाता है ।

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गर्भाधान संस्कार