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1. " ब्रह्मचर्य की महत्व..."

ब्रह्मचर्य एक ऐसा धर्म , जिसकी पवित्रता ,पावनता और स्वाच्छता से कोई इनकार नही कर सकता । विश्व के समस्त धर्मोँ मेँ ब्रह्मचर्य को एक पावन और पवित्र धर्म माना गया है । इसकी चमत्कार से सभी प्रभावित है । जीवन के ऊँचे से ऊँचे ध्येय को प्राप्त करने के लिए ब्रह्मचर्य से बढ़कर अन्य कोई साधन क्या हो सकता है ? एक सच्चे ब्रह्मचारी मेँ अपार बल अमित शक्ति और प्रचण्ड पराक्रम का भंडार प्रकट हो जाता है । भगवान महावीर के अनुसार " वीर्य रक्षण एक शाश्वत धर्म है , ध्रुव है , नित्य है और कभी मिटनेवाला नही है। " अतीत काल मेँ अन्नत साधकोँ ने इसकी विशुद्ध साधना के द्वारा सिद्धि की उपलब्धि है , और अन्नत भविष्य मेँ भी अन्नत साधक इस ब्रह्मचर्य की साधना के द्वारा सिद्ध को प्राप्त करेँगेँ । ब्रह्मचर्य , जीवन के भव्य भवन निर्माण की आधारशीला है । जो व्यक्ति विशुद्ध भाव से ब्रह्मचर्य का पालन करता है , वह पूज्योँ का पूज्य बन जाता है । ब्रह्मचारी दीर्घजीवी होता है । उसका शरीर स्वस्थ रहता है , उसका मन प्रसन्न रहता है तथा उनकी बुद्धि भी स्वच्छ एंव पवित्र रहती है । इसलिए बाइबिल मेँ भी एक नही , अनेक स्थानोँ पर व्याभिचार , विषय-वासना और विलासिता आदि दुर्गुणोँ की भत्सर्ना की गई है और इसके विपरीत त्याग , संयम , शील और सदाचार तथा ब्रह्माचर्य के मधुर-मधुर गीत गाए गये है । ब्रह्मचर्य पालन से तनबल और आत्मबल बढ़ता है । ब्रह्मचारी पुरुष निर्भीक , सत्साहसी और अप्रमादी होते हैँ । उनमेँ अद्भुत सौन्दर्य , माधुर्य , विलक्षण प्रतिभा , अदम्य उत्साह प्रभृति सभी दैवी गुण कूट-कूट कर भरे रहते हैँ । वे ओजस्वी , तेजस्वी , मनस्वी , वर्चस्वी , यशस्वी और दृढ़निश्चयी होते हैँ । इस ब्रह्मचर्य के बल से ही तो गाँधीजी ने भारत को आजाद कराया । वे कहते थे " एक अच्छे ब्रह्मचर्य का जीवन के वचन मेँ इतनी ओजपूर्ण शक्ति होती है कि आम आदमी उसके वचन को काट ही नहीँ सकता । जिस व्यक्ति ने कामुकता का पूर्णतया उन्मूलन कर डाला है तथा जो मानसिक ब्रह्मचर्य मेँ प्रतिष्ठित हो चुका है , वह व्यक्ति साक्षात्‌ ब्रह्म है । -: ब्रह्मचर्य - सूक्तियाँ :- 1. जिस वीर्य की एक बूँद किँवा एक कण से ऐसी उत्तम देह बनती है , उसकी असंख्य बूँदेँ एवं कणोँ का संचय जिस ब्रह्मचारी के शरीर मेँ होता है उसकी शक्ति , प्रतिभा तथा महत्ता का वर्णन कौन कर सकता है ? - अभिलाष दास 2. ब्रह्मचर्य कामद मणि है । ब्रह्मचर्य से ही लौकिक तथा परलौकिक उन्नति सम्भव है । ब्रह्मचर्य धारण करके ही सत्य रूपी हीरा मिल सकता है । ब्रह्मचर्य से ही स्वरूय ज्ञान मेँ स्थिति हो सकती है । ब्रह्मचर्य समस्त मानवीय उन्नतियोँ की रीढ़ है । - अभिलास दास 3. ब्रह्मचर्य वह मणि है जो किसी प्रतिकूल परिस्थितिरूपी हवा-पानी से नही बुझता । ब्रह्मचर्य जहाँ रहता है , प्रकाशित रहता है । - अभीलास दास 4. जिसके पास ब्रह्मचर्य है वही भाग्यवान्‌ है । अब्रह्मचारी से बढ़कर अभागा कोई नहीँ है । - आज्ञानंद 5. अनुराग सहित स्त्री को देखकर भी जिसका मन व्याकुल नहीँ होता , वह महाशय मुक्त-रूप है । वही असली ब्रह्मचारी है । - कपिल गीता 6. जैसे लोहे का मोरचा( जंग ) उससे उत्पन्न होकर उसी को खाता है , वैसे ही सदाचार( ब्रह्मचर्य ) का उल्लंघन करने वाले मनुष्य के अपने ही कर्म उसे दुर्गति को प्राप्त कराते हैँ । - भगवान बुद्ध 7. खुन क्या लाल ही होता है ? नही-नही , सफेद भी होता है । जो इस मानवी शक्ति , श्वेत रक्त(ब्रह्मचर्य) को नाश करता है , वह स्वय एवं देश की बरबादी करता है । - स्वामी रामतीर्थ देवजी 8. अब्रह्मचर्य ही मनुष्य के पतन का मूल कारण है । जिस मनुष्य ने धोखे से भी स्त्री की ओर अभिलाषा भरी दृष्टि से देख लिया , उसने मन मेँ व्यभिचार कर लिया । - महात्मा ईसा मसीह 9. भेकम्प बंद करो अथार्त्‌ ब्रह्मचर्य रोको , तभी जीवनरूपी गाड़ी सही दिशा मेँ जायेगी । - श्री कुलदीप बाबा 10. ब्रह्मचर्य क्या है ? ब्रह्मचर्य शरीर का सार है । आत्म दर्शन करना इसका चमत्कार है । - आत्मशोधक 11. ऐ विद्यार्थियोँ ! तुम अपने को अकेला मत समझो । तुम्हारे अंदर तुम्हेँ महामानव बतानेवाला शुक्र मौजूद है । - आशाराम बापू 12. ब्रह्मचर्य आश्रम बाकी सभी आश्रमोँ की आधार शिला है ।सारे सुख का मुल इस वीर्य रक्षा मेँ छिपा हुआ है । यह संजीवनी बूटी है । इस व्रत के व्रती बनकर तुम शारीरिक , मानसिक , सामाजिक एवं आत्मिक उन्नति करो । - भक्त पूर्ण सिँह 13. जैसे विडालोँ के वास स्थान के पास चुहोँ के लिए रहना योग्य नहीँ है , वैसे स्त्रियोँ के निवास स्थान के बीच रहना ब्रह्मचारी के लिए योग्य नहीँ है । जिस प्रकार मुर्गोँ के बच्चे को बिल्ली से प्राणापहार का भय सदा बना रहता है , ठीक वैसे ही ब्रह्मचारी को भी नित्य स्त्री सम्पर्क मेँ रहने से अपने ब्रह्मचर्य के भंग होने का भय बना रहता है । - भगवान महावीर 14. जो व्यक्ति अपने आप पर नियन्त्रण नहीँ कर सकता , वह कभी स्वतंत्र (ब्रह्मचारी) नहीँ हो सकता । - पाईथोगोरस 15. मित्रोँ ! ब्रह्मचर्य मनुष्य मेँ स्वास्थय का एक बहुत बड़ा अंश है । उसकोँ व्यर्थ नष्ट मत करो , बल्कि उसको बढ़ाने(रोकने) का प्रयत्न करो । - बाबा देवी साहब 16. कल्याण इच्छुक को चाहिए कि वह विवाह न करे । यदि कर लिया हो तो स्त्री-पुरूष परस्पर भाई-बहन की भाँति रहे । - टाल्सटाय 17. बालक माता के दोष के कारण चरित्रहिन , पिता के दोष के कारण मुर्ख , वंश दोष के कारण कायर और स्वयं के दोष के कारण दरिद्र होता है । - सुभाषितानि

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