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2. ब्रह्मचर्य का तात्त्विक अर्थ

2. ब्रह्मचर्य का तात्त्विक अर्थ
A ब्रह्मचर्य का साधारण अर्थ -: " ब्रह्मचर्य " शब्द बड़ा प्यारा है , बड़ा अद्‌भुत है । इस शब्द मेँ बड़ा राज है , बड़ा रहस्य है । मनुष्य नित्य प्रति जो कुछ भी खाता है और शरीर पर लगता है एवं सूँघता है , वह सब कुछ शरीर मेँ पहुँचकर सबसे पहले उसमेँ से रस बनता है , फिर रस से 5-5 दिनोँ के अन्तर से रूधिर , रूधिर से मांस , मांस से मेद और मेद से अस्थि एवं अस्थि से मज्जा तथा मज्जा से सातवाँ पदार्थ जो सबका सारभुत निचोड़ है , अंत मेँ वीर्य बनता है । स्त्री मेँ यह धातु बनती है उसे "रज" कहते है । यही वीर्य(रज) जो ब्रह्मचर्य कहलाता है ,ओजस्‌ एवं तेजस्‌ होकर समग्र शरीर मेँ फैल जाता है । इसी को जीवनी शक्ति भी कहते हैँ । सुश्रुत के अनुसार ब्रह्मचर्य छ: मंजिलोँ( रस , रक्त , मांस , मेद , हड्डी और मज्जा) से गुजरा हुआ शरीर का वह सारभुत अनमोल पदार्थ है , जिसको अल्प मात्र भी पूणतया तैयार होने मेँ 30 दिन 4 घंटे लगते है । जो आत्मदर्शन कराने मेँ मददगार होता है , जो जीवन मेँ खुशियाँ एवं तन्दुरुस्ती का खजाना भर देता है । जो चेहरे पर तेज , वाणी मेँ ओज और शरीर मेँ उत्साह का एकमात्र कारण है , उसे हम ब्रह्मचर्य कहते हैँ । B शास्त्र के अनुसार " ब्रह्मचर्य " का अर्थ - ब्रह्मचर्य मूलत: संस्कृत भाषा का शब्द है और व्याकरण के अनुसार जब उसका विश्लेषण करते हैँ , तब दो शब्द हमारे सामने आते हैँ - ' ब्रह्म ' और ' चर्य ' । इन दो शब्दोँ से मिलकर एक ' ब्रह्मचर्य ' शब्द बना है । ' ब्रह्म ' का अर्थ है - शुद्ध आत्म भाव ; और 'चर्य' का अर्थ है - गति करना । 'ब्रह्म' की ओर चर्या करना , गति करना या चलना ब्रह्मचर्य है । मतलब यह कि ब्रह्म के लिए , परमात्म भाव के लिए चलना , गति करना . उस ओर उन्मुख(अग्रसर) होना , उसके लिए साधना करना , ईश्वरीय आचरण व दिव्य आचरण करना यही ब्रह्मचर्य का अर्थ है । ब्रह्मचर्य ध्यान का अंतिम फल भी है । अथर्ववेद मेँ तो वेद को भी ब्रह्म कहा गया है । अत: वेद के अध्ययन के लिए आचरणीय कर्म ब्रह्मचर्य है । जो जीवन के भव्य भवन निर्माण की आधारशीला है , उसे ब्रह्मचर्य कहते हैँ । और जो जीवन मेँ परमात्म भाव की ज्योति झलका दे , ब्रह्मचर्य है । योग संबंधि ग्रंथोँ मेँ ब्रह्मचर्य का अर्थ " इन्द्रिय-संयम " किया गया है । हाँ , ब्रह्मचर्य का अर्थ मन , वचन एवं कर्म से समस्त इन्द्रियोँ का संयम करना भी है । जबतक अपने मन के विचारोँ पर इतना अधिकार न हो जाए कि अपनी धारणा एवं भावना के विरुद्ध एक भी विचार न आए , तबतक वह पूर्ण ब्रह्मचर्य नही है । वस्तुत: सभी इन्द्रियोँ के विषयोँ से पूर्ण स्वतंत्र होना ही ब्रह्मचर्य है । C ब्रह्मचर्य शब्द का भावार्थ - पाइथेगोरस कहता है - No man is free , who cannot command himself. जो व्यक्ति अपने आप पर नियत्रण नहीँ कर सकता , वह कभी भी स्वतंत्र (ब्रह्मचारी) नहीँ हो सकता । अत: हम कह सकते हैँ कि वासना को उद्दीप्त करनेवाले साधनोँ का परित्याग ही ब्रह्मचर्य है । ' ब्रह्मचर्य ' का अर्थ केवल स्त्री-पुरुष के संयोग एवं संस्पर्श से बचने तक ही सीमित नही है । वस्तुत: आत्मा को अशुद्ध करनेवाले विषय-विकारोँ एवं समस्त वासनाओँ से मुक्त होना ही ब्रह्मचर्य है । ब्रह्मचर्य आत्मा की निर्धुम ज्योति है । अत: मन , वचन एवं कर्म से वासना का उन्मूलन करना ही ब्रह्मचर्य है । गाँधीजी के अनुसार स्त्री-संस्पर्श एवं संभोग का परित्याग ब्रह्मचर्य के अर्थ को पूर्णत: स्पष्ट नहीँ करता ; क्योकि यदि कोई व्यक्ति स्त्री का स्पर्श नहीँ करता और उसके साथ संभोग भी नही करता , परंतु विकारोँ से ग्रस्त रहता है ; रात-दिन विषय-वासना के बीहड़ वनोँ मेँ अन्तर्मन से मारा-मारा फिरता है , तो उसे हम ब्रह्मचारी नहीँ कह सकते । और किसी विशेष परिस्थिती मेँ निर्विकार भाव से किसी स्त्री को छु लेने मात्र से ब्रह्म-साधना नष्ट हो जाती है , ऐसा कहना भी भूल होगी । श्रीमद्‌ रायचन्द जी ठीक ही कहा है : निरखी ने नव यौवना , लेश न विषय निदान । गणे काष्ठ नी पूतली , ते भगवंत समान । । ब्रह्मचारी रहने का यह अर्थ नहीँ है कि मैँ किसी स्त्री का स्पर्श न करुँ ? अपनी बहन का स्पर्श न करुँ ? ब्रह्मचारी होने का भाव है कि स्त्री का स्पर्श करने से मेरे मन मेँ किसी प्रकार का विकार उत्पन्न न हो , जिस तरह कि कागज को स्पर्श करने से नहीँ होता । अस्तु , ब्रह्मचर्य अन्तर्मन कि निर्विकार दशा का ही नाम है ।

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