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3. विश्लेषण " ब्रह्मचर्य " शब्द का

ब्रह्मचर्य नैतिकता का आधार है ।यह शाश्वत जीवन का आधार है । ब्रह्मचर्य वसंत ऋतु का पुष्प है , जिसकी पँखुड़ियोँ से अमरत्व टपकता है । यह आत्मा के लिए शान्तिमय जीवन का आधार है । यह ऋषियोँ , मुनियोँ तथा योग के साधकोँ का बहुअभिप्सित ,ब्रह्मनिष्ठोँ का सृद्दढ़ आश्रय है । यह आन्तरिक असुरोँ-काम , क्रोध , लोभ , आदि के विरुद्ध संग्राम करने के लिए रक्षा-कवच है । जो हमेँ नित्य , अविच्छिन्न अक्षय आनंद प्रदान करता है , वही तो ब्रह्मचर्य है । शास्त्र के अनुसार ब्रह्मचर्य , निम्नलिखित अष्ट मैथुनोँ से विरत होने का नाम भी है , यथा "स्मरणं कीर्तनं केलि प्रेक्षणं गुह्मभाषणम्‌ । संकल्योअ्‌ध्यवसायश्च प्रवदन्ति मनीषिण : ॥ एतन्मैथुनमष्टांग प्रवदन्ति मनीषिण: । विपरीत ब्रह्मचर्य एतत्‌ एवाष्ट लक्षणम्‌ ॥" अर्थात्‌ 1. स्मरण ( स्त्री चिन्तन करना ) 2. कीर्तन ( स्त्री के गुणोँ का बखान करना ) 3. केलि ( स्त्री संग कोइ खेल या हँसी मजाक करना ) 4. प्रेक्षण ( स्त्री को काम भाव से देखना ) 5. गुह्र भाषण ( स्त्री के साथ एकांत मेँ बातचीत करना ) 6. संकल्प ( नारी से मिलने के लिए उत्सुक हो संकल्प लेना ) 7. अध्यवसाय ( उसकी प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना ) 8. संभोग ( प्रत्यक्ष रूप से मिलना या स्पर्श करना ) ये अष्ठ मैथुन है । इन अष्ठ मैथुनोँ से पुर्णतया अछुता ( अपराम ) होना ही ब्रह्मचर्य है । एक दार्शनिक विद्वान ने ब्रह्मचर्य का व्यापक अर्थ करते हुए लिखा है कि "अपने मन की बिखरी हुई शक्तियोँ को सब ओर से हटाकर किसी एक पवित्र बिन्दु पर केन्द्रित कर लेना ही वास्तविक एवं सच्चा ब्रह्मचर्य हैं।" नीतिशास्त्र के अनुकूल ब्रह्मचर्य का अर्थ है : मनुष्य जीवन मेँ काम शक्ति के रूपान्तरण , ऊध्वीकरण व संशोधन करने का नाम । ब्रह्मचर्य मानव कल्याण एवं अभ्युदय का प्रशस्त पथ है । ब्रह्मचर्य मानव जीवन की सर्वांगीण उन्नति के लिए अत्यन्त विचारवान सिद्धांन है ।

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