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4. एक नारी ब्रह्मचारी बनने के कुछ कठोर नियम

क्या गृहस्थ-जीवन सिर्फ कामुक तथा लम्पट होकर बिताने के लिए है ? नही ! नही ! यह तो अत्यन्त धर्मपरायण एंव परम पवित्र जीवन है । अस्तु , ' एक नारी ब्रह्मचारी 'का दावा ( शर्त ) वही व्यक्ति कर सकता है , जो 1-2 बच्चे होने के बाद आपस मेँ पति-पत्नि का संबंध न रखकर भाई-बहन का रिस्ता बना लेता है । वह अलग विछावन पर शयन करता है । सच्चाई से स्वयं दोनोँ इस पवित्र रिस्ते को निभाने के लिए कटिबद्ध प्रयत्न करते है । बिना पत्नि(पति) का - बिना परिवार का ब्रह्मचर्य पालन सरल है ; क्योकि उसमेँ अभावजन्य विवशता है । पर जहाँ प्रतिबन्ध न होते हुए भी स्वेच्छा से प्रतिबन्ध लगाता है , वहाँ वह प्रक्रिया तप बन जाती है । घर मेँ भोजन न हो और भुखा रहना पड़े , तो वह विवशता का उपवाश है , पर जहाँ घर मेँ व्यञ्नोँ की कमी न होते हुए भी आहार का परित्याग किया जाता है , उपवास तो उसी को कहा जाता है । अतएव , 1-2 संतान हो जाने पर स्त्री-पुरूष दोनोँ को अखण्ड ब्रह्मचारिणोँ तथा ब्रह्मचारी हो जाना चाहिए । यदि ऐसा न कर सके , तो कम-से-कम संतान के किशोर हो जाने पर तो माता पिता दोनोँ को अवश्य शुद्ध ब्रह्मचारी बनना चाहिए ; क्योकि बच्चे अक्सर जब 8-10 वर्ष के होने लगते हैँ , तब से ही वे सांसारिक बातोँ को कुछ-न-कुछ जानने लगते हैँ। जो माँ-बाप घर मेँ बच्चोँ के समझदार हो जाने पर भी इस मलिन क्रिया को करते है , वे घोर पाप करते हैँ । क्योकि इसका असर उस किशोर ( मासुम ) बच्चोँ पर बहुत बुरा पड़ता है । बेशक , माँ-बात छिपकर इस कुकृत्य को करेँ । फिर भी इश्क और मुश्क कभी छिपता नहीँ है । मनीषियोँ नेँ यहाँ तक कहा है कि - "अतिमैथुन से घर का वायुमडल भी दूषित हो जाता है । कामी व्यक्ति के शरीर से एक ऐसी गन्दी नैसर्गिक आभा नि:सृत होती है , जो आस-पास के लोगोँ को भी प्रभावित करती है । और फिर बाद मेँ माँ-बाप को जानकर हैरानी होती है कि मेरा बच्चा बदचलन(उद्दण्ड) कैसे हो गया । अरे ! घर मेँ माँ-बाप ही विषय-लम्पट होँ , कामी होँ , तो बच्चे उनके कैसे होँगे । और इसमेँ संदेह क्या कि माँ-बाप के अच्छे संस्कार का प्रभाव बच्चोँ पर पड़ सकता है , तो बुरे कर्मोँ का क्योँ नहीँ पड़ेगा ? अवश्य पड़ेगा । यह अटूट सत्य है कि माता-पिता का संस्कार , चाहे अच्छा हो या बुरा , बच्चे की भलाई का ध्यान रखकर भी माता-पिता को आपस मेँ जरूर संयम बरतना चाहिये । बच्चे जब 8-10 वर्ष के हो जायेँ , तब माता -पिता को सदैव ब्रह्मचारी बन जाना चाहिये । स्त्री प्राय: घोर द:ख(प्रसव-पीड़ा) के समय भगवान से यही प्रार्थना करती है कि हे भगवान - एक बार मुझे इस दु:ख से उबारो , फिर मैँ कभी भी इस दु:ख के कारणस्वरूप पति-मिलाप के क्षणिक सुख को नहीँ भोगूँगी अर्थात्‌ पति स्पर्श नहीँ करूँगी । पर अपसोस ! असह्र कष्ट से मुक्त होते ही वह दुसरे ही क्षण अपनी प्रतिज्ञा को भुल जाती है और फिर वह घोर नरक सदृश दु:ख को प्राप्त करने के लिये वही कार्य दोहराने लगती है । ऐसी स्त्री भला कैसे अपने पति को "एक नारी ब्रह्मचारी" बनने मेँ मदद कर सकती है ? अथवा स्वयं भी कैसे अपने पति के साथ रह कर भी आर्दश ब्रह्मचारिणी कहला सकती है ? वस्तुत: यह महान्‌ कार्य तो दोनोँ के परस्पर सहयोग से सम्भव होगा । स्वामी रामकृष्ण देवजी कहते थे - "जो स्त्री पति के साथ रहते हूए भी ब्रह्मचर्य-पालन करती है , वह तो साक्षात्‌ भगवती(देवी) ही है ।" ऐसे संयमी ,गृहस्थ - दम्पति के शरीर मेँ वृद्धावस्था तक भी बल , बुद्धि और साहस प्रचुर मात्रा मेँ झलकता है । उन दोनो संयमी पति-पत्नि के चेहरे पर अद्‌भुत तेज चमकता हुआ नजर आता है । बचपन से युवावस्था आने तक जो वीर्य-संयम होता है , वह शरीर मेँ ओज के रूप मेँ स्थित रहता है । वह तो वीर्य-क्षय से नष्ट होता ही है । अतिमैथुन से तो हड्डिड़ोँ मेँ से भी कुछ सफेद अंश निकलने लगता है , जिससे व्यक्ति अत्याधिक कमजोर हो जाता है ।फिर सारी उम्र दुग्ध , बादाम , मकरध्वज व शिलाजीत ही क्यो न खाये , उस खोई हुई अनमोल शक्ति की पूर्ति नही हो पाती । अत: हमेँ इसकी प्रत्येक बुँद के संरक्षण का यथाशक्य प्रयास करना चाहिए । आप गृहस्थाश्रमी हैँ तो क्या ? जो इस मानवी शक्ति को फजूल मौज-मस्ती के ख्याल से व्यय करता है , उसके नेत्र धँस जाते हैँ , नेत्रोँ के चारोँ तरफ नीलीरेखाएँ निकल आती है । वह स्मृति नाश , दृष्टिक्षीणता ,दुर्बलता , अतिनिद्र , आलस्य , चिड़चिड़ेपन और उदासी जैसी तमाम बीमारियोँ का शिकार बन जाता है । कई लोग तो अत्याधिक मैथुन से नपुंसक भी बन जाते हैँ । फिर वे किसी के सम्मुख आँख उठा कर देख भी नहीँ पाते । उनका जीवन नारकीय बन जाता है । इस नारकीय जीवन से उबरने का एक ही रास्ता है : ब्रह्मचर्य । ब्रह्मचर्य-पालन न केवल संन्यासी के लिए आवश्यक है , अपितु एक अच्छे गृहस्थ के लिए भी उतना ही जरूरी है । वीर्य-रक्षण का इतना महान्‌ महत्व होने के कारण ही हमारे ऋषि मुनियोँ ने कब मैथुन करना , किससे करना और जीवन मेँ कितनी बार करना चाहिए , आदि-आदि निर्देशन शास्त्रोँ मेँ निश्चित कर रखे हैँ । अत: गृहस्थाश्रम के पुरुष तथा स्त्री दोनोँ को चाहिए कि इस महत्वपूर्ण विषय "एक नारी ब्रह्मचारी" को चरितार्थ करने के लिए ब्रह्मचर्य के परम लक्ष्य को समझेँ तथा इस महाव्रत का नियमनिष्ठता से पालन करेँ ।

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