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5. असंयमित इन्द्रियाँ वासना उभारती हैँ :-

भारत के प्राचीन योगी , ऋषि एवं मुनियोँ ने "ब्रह्मचर्य" शब्द की व्याख्या करते हुए यह बताया है कि आठ प्रकार के मैथुन से विरत होना ही ब्रह्मचर्य है । ये अष्ठ मैथुन इस प्रकार हैँ : स्मरण , कीर्तन , केलि , प्रेक्षण , गुह्र भाषण , संकल्प , अध्यवसाय और संभोग ।

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