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हस्तमैथुन-मैथुनके भयावह परिणाम तथा पुन: सँभलने की मंत्रणा

अवश्य ही काम अति वेगवान्‌ , चंचल , प्रबल और अति कठिनता से वश मेँ होने योग्य है , परंतु यह अजेय भी नहीँ है । उसे जीता जा सकता है । पर , कैसे जीता जा सकता है ? हठात्‌ दुराग्रह से दमन करके । नहीँ नहीँ ! काम शक्ति का हठात्‌ दमन करना उचित नहीँ , उसका रूपान्तरण किया जा सकता है । क्योँकि वासना का दमन करने से वासना नष्ट नहीँ होती , बल्कि वह तो राख से ढ़ँकी आग की भाँति भीतर छिपी रहती है । जैसे अल्प अनिल-प्रवाह से अनल निकल आता है , वैसे ही विषय-बयार के आते ही मनुष्य पुन: काम विकार का शिकार हो जाता है । अत: कामशक्ति का दमन सही हल नहीँ है । सही हल है इस शक्ति को ऊर्ध्वमुखी बना कर शरीर मेँ ही उपयोग करके परम सुख को प्राप्त करना । सभ्यता एवं संस्कृति का विकास , इसी काम-इच्छा के अवरोध , मार्गान्तरीकरण अथवा शोध मेँ है । किन्तु अफसोस ! आज के नवयुवक व नवयुवतियाँ इस अनमोल ब्रह्मचर्य को ऊर्ध्वमुखी बनाकर सुख पाने की जगह मेँ ब्रह्मचर्य को अधोमुख करके दु:ख व कष्ट उठा रहे हैँ । एक निष्पाप युवक(ब्रह्मचारी)को प्रारंभ ( 15-20 वर्ष की उर्म ) मेँ प्राय: कुतूहल होता है कि वीर्य क्या है ? वह कैसे होता है ? वह कैसे निकलता है ? आदि-आदि । और स्वप्रथम वह कुतूहलवश ही हस्थमैथुन कर बैठता है और बाद मेँ अपनी अज्ञानता पर पछताता है । कितने दु:ख की बात है कि आज के लड़के तथा लड़कियाँ विद्यार्थी जीवन से ही अवैध रूप से शारीरिक अंगोँ का दुरुपयोग करने लगते है और अपनी जीवन-शक्ति तक को खो बैठते हैँ तथा मौन रूप से अन्दर-ही-अन्दर कष्ट को झेलते रहते हैँ । परिणामत: वे अपने सामान्य मानसिक तथा शारीरिक विकास मेँ गतिरोध उत्पन्न पाते हैँ । यही वजह है कि आज के अत्याधिक युवक-युवतियाँ रक्त-क्षीणता , स्मरणशक्ति के ह्रास तथा दुर्बलता से पीड़ित होते हैँ । उन्हेँ अपना अध्ययन तक बंद कर देना पड़ता है । भयंकर से भयंकर रोग स्वास्थ को जितना नहीँ बिगाड़ता , उतना यह अप्राकृतिक मैथुन पाप बिगाड़ता है । हस्त-ध्वंस हुए वीर्य का जो कुप्रभाव शरीर पर पड़ता है , वह अवर्णनीय है । जो युवक इन दुव्यर्यसनोँ मेँ बुरी तरह फँस जाता है , वह अपनी वीर्यधारणा शक्ति तक भी खो बैठता है और वह तीव्रता से नपुंसकता की ओर अग्रसर होने लगता है । उसकी आँखेँ और चेहरा निस्तेज पड़ जाता है । उनकी संकल्पशक्ति निर्बल हो जाती है । वह 25 वर्ष मेँ ही बुढ़ा बन जाता , थोड़े परिश्रम से ही हाँपने लगता है । उसकी आँखोँ के सामने अँधेरा छाने लगता है । अधिक कमजोरी से उन्हेँ मूर्च्छा भी आने लगती है । उसका जीवन जीवन नहीँ रहता । ऐसे व्यक्ति की हालत एक मृतक पुरुष जैसी हो जाती । सब प्रकार के रोग उन्हेँ घेर लेते हैँ । कोई दवा उसपर असर नहीँ कर पाती । उसे अपने अतीत की अज्ञानभरी दृष्ट(बुरी) आदतोँ पर रोना आता है । ऐसे व्यक्ति जीते-जी नरक का दु:ख भोगते रहते हैँ । उसका जीव सर्वतोमुखी पतित होता है । आखिर इन सब घोर द:खोँ की जननी कौन हुआ ? खूद व्यक्ति की मूढ़तावश किया गया दुर्व्यसन तथा अमर्यादित मैथुन । जिसने उस क्षणिक वेग को रोक लिया , वही धन्य है । जो स्वयं को सँभाला है , उसमेँ शक्ति , उत्साह , ओज और चमक बरकरार रहती है । वर्ना क्षणमात्र का विषय-सुख तो ये सब चीजेँ(शक्ति , उत्साह ,ओज और चमक) बहा ही ले जाते है । पैर मेँ कुल्हाड़ा मारने से उतनी हानी नहीँ है , जितनी कि विषय विकार मेँ फँसने से । कुल्हाड़ा तो सिर्फ पैर को कमजोर करता है ,परंतु अब्रह्मचर्य तो सारे शरीर को कमजोर कर देता है । अत: मेरे नौजवाज भाइयोँ एवं बहनोँ ! इस अत्यन्त घृणित , भयंकर दुष्परिणामकारी व घोर निन्दनीय कार्य हस्त-मैथुन को न करेँ और अपना भावोँ जीवन तन्दुरुस्त एवं सुखमय गुजारेँ । सँभलकर न चलना बुरा है ; किन्तु ठोकर लगने पर भी न सँभलना ज्यादा बुरा है । अस्तु , जो बीत गई , सो बात गई । किन्तु अब तो अपने को सँभालोँ , अपने बुरे कार्योँ को रोकोँ । और हाँ , अतीत को स्मरण कर चिन्ता भी मत करना ; क्योकि अगर सुबह का भुला शाम को वापस आ जाय , तो वह भूला नहीँ कहलाता । लेकिन अब तो इस अमूल्य ब्रह्मचर्य की अन्नत महिमा को समझोँ और इसे मानव-जीवन के सदुपयोग मेँ लगाओ । इसे पतन की राह न ले जाकर उत्थान की राह लगाओ । अर्थात्‌ पहले यौन रोग का इलाज कराये साथ-साथ ब्रह्मचर्य का पालन करोँ । अगर आपके पास ईलाज के कुछ रूपये नही है तो FREE इलाज नीचे दिया जा रहा है उसे सेवन करे 1) 2 कोया लहसुन को चबाकर उपर से गर्म दुध पीयेँ NOTE : लहसुन गर्म होता है । कृपया इसका प्रयोग करते समय खुब पानी पीयेँ अगर सर्दी के मौसम मेँ इसका प्रयोग करेँगे तो बेहतर होगा परंतु तब भी पानी पीये । 2) सुबह बरगद के वृक्ष के नीचे जायँ और उसका दूध एक बतासेँ मेँ भरकर खा लिया करेँ । 3 माह तक खायेँ । 3) पँचगुरिये को पीसकर गाय के दुध के साथ पीने से यह रोग मूल रूप से नष्ट हो जाता है । साथ मेँ किसी महापुरूष का ध्यान करना चाहिये या फिर फेसबुक पर खोजे " Brahamacharya kumar" और दोस्त बनाये और नोट देखे"विश्लेषण ब्रह्मचर्य शब्द का " या " ब्रह्मचर्य का तात्त्विक अर्थ" और अष्ठ मैथुन दिये गये है उसे पढ़े , सोचे एवं चलने का प्रयास करेँ ।

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