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हीनभावना से होता है क्रोध

क्रोध की उत्पत्ति होने के साथ ही हमारा विवेक हमसे जुदा हो जाता है और हम इस कारण से पागल हो उठते है । विवेक के हमसे दूर होते ही हमारा धैर्य टूट जाता है और हम अपने होशो हवास मेँ नहीँ रहते । होश आने के बाद शिवाय पश्चाताप के आँशुओँ के कुछ नही बचता है । क्रोध जहाँ हमेँ एक बुरे इन्सान और दुर्दिन के दर्शन कराता है वही स्वयं की असुरक्षा की भावना को प्रबल करता है । क्रोध का जन्म हीनता की भावना से ग्रसित होने पर होता है । जब हम कहीँ पर स्वय छोटा महसूस करेँ या हमारे स्वाभिमान को चोट पहुँचे तब हमारी भावनाएँ इस बहकावे मेँ फँस जाती हैँ कि हमारी सोच व प्रवृत्ति उचित है , क्योँकि आकलन का कार्य हमारे मस्तिक द्वारा ही संपादित हुआ है । अत: स्वयं को श्रेष्ठ समझना व अपने महत्व को प्रदर्शित करना हमारा उद्देश्य बन जाता है । यदि आप किसी व्यक्ति को तुच्छ , नाकारा या गया गुजरा समझना शुरु कर देँ और वह व्यक्ति स्वयं को कमजोर व हीन नही समझता तब आप पर हाने का प्रयास करेगा और चाहेगा कि वह स्वयं सही सिद्ध कर सके । बड़े-बड़े विद्वान व मनीषी भी इस प्रकार क्रोध के मकड़जाल मेँ फँसकर स्वयं को असहाय व अपमानित कर लेते हैँ । व्यक्ति हीन भावना के कारण ईर्ष्या , द्वेष , अहंकार , विरोध , वैमनस्यता व झुठ दिखावे के जाल मेँ फँस जाता है । यही तथ्य व्यक्ति के क्रोध की उत्पत्ति के कारण बन जाते हैँ । यदि आप इस क्रोध की प्रवृत्ति से बच रहना चाहते है तो इन अवगुणोँ को पहचान कर पृथक की आवश्यकता है । क्रोध हमारी उपापचय क्रियाओँ को प्रभावित करने का माध्यम होता है । क्रोध की उत्पत्ति के कारण हमारा शरीर मेँ रासायनिक परिवर्तन होते हैँ । यह शरीर को धीमे जहर की भाँति नुकसान पहुचाता है । फिर सच्चाई यही होती है -: दिल के फफोले जल उठे इस दिल की आग से । घर को ही आग लग गई घर के चिराग से । अर्थात्‌ हमारे अंदर क्रोध की आग ही हमारे व्यक्तित्व रूपी अस्थित्व को नष्ट कर देती है । क्रोधित रहनेवाले व्यक्ति का स्वाभाव हीन भावना से ग्रसित होकर शंकालु , चिड़चिड़ा व क्रियाहीन हो जाता है । व्यक्ति की मानसिक स्थिती पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और यही विचार उस पर प्रभावी हो जाते हैँ । क्रोधित व्यक्ति मेँ उस समय असाधारण बल दिखलाई देता है और वह लड़ने-झगड़ने पर आमादा हो जाता है । क्रोध की उत्पत्ति मेँ लोभ का भी योगदान रहता है । लोभ अर्थात्‌ किसी वस्तु विशेष की प्राप्ति , जिसकी प्राप्ति न होने के कारण क्रोध उत्पन्न होता है । धैर्य न रख पाना या वस्तु प्राप्ति की प्रबल इच्छा भी क्रोध के जन्म का कारण है । यदि कोई वस्तु आपको प्राप्त नही होती तब आपका असंयमित मन दुर्विचारोँ व दुर्भावनाओँ से ग्रसित हो जाता है और वस्तु प्राप्ति न होने पर क्रोध आरम्भ हो जाता है । क्रोध ही आपसी झगड़े का कारण होता है । जब व्यक्ति स्वयं पर नियंत्रन नही रख पाता तब उसके क्रोध के कारण दु:ख व कष्टोँ द्वारा उसे घेर लिया जाता है ।

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