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ब्रह्मचर्य पालन की आवश्यकता क्यो ?1. ब्रह्मचर्य-हीन युवकोँ की भर्त्सना :-

मनुष्य का यह महान्‌ जीवन ब्रह्मचर्य की आधारशिला पर टिका हुआ है । ब्रह्मचर्य ही शरीर को सशक्त और जीवन को शक्तिसम्पन्न बनाता है । सबल जीवनवाला मनुष्य गृहस्थ-जीवन मेँ भी मजबूत बनकर अपनी यात्रा सफलतापूर्वक सम्पन्न कर सकता है और यदि वह साधु जीवन प्राप्त करेगा तो उसको भी श्रेष्ठ बनाएगा । ऐसा व्यक्ति जहाँ रहेगा , वहीँ शक्ती का प्रचण्ड झरना बहाएगा । वह अपने कर्त्तव्योँ से कभी भी विमुख नही होगा ; बल्कि कर्त्तव्य-पालन अपने प्राणोँ की बाजी लगा कर करेगा । लेकिन अफसोस ! आज भारतीय तरुणोँ के चेहरे पर चमक नहीँ रही । कहाँ गई वह भाल पर उद्भासित होनेवाली आभा ? कहाँ चली गई ललाट की वह ओजस्विता ? सभी कुछ तो वासना की आग मेँ जलकर राख बन गया है । आज नैसर्गिक(प्राकृतिक) के स्थान पर कृत्रिम साधनोँ द्वारा सुन्दरता पैदा करने का प्रयत्न किया जाता है । पर , क्या कभी मुर्दे का श्रृंगार , उसकी शोभा बढ़ाने मेँ समर्थ हो सकता है ? जीवन मेँ असली रंग ब्रह्मचर्य का है , किन्तु वह नष्ट हो रहा है । और देश के हजारोँ नौजवान , जवानी का दिखावा करने के लिए अपने चेहरे पर रंग पोतने लगे हैँ । परंतु रंग पोतने से क्या होगा ? यदि चेहरे पर चमक और दमक लानी है , ओज और तेज लाना है , जीवन को सत्त्वमय और क्षमताशाली बनाना है और मन को सशक्त बनाना है तथा जीवन को सफल एवं कृतार्थ करना है , तो ब्रह्मचर्य-पालन आवश्यक है । ब्रह्मचर्य की उपासना से ही जन्म मेँ और जन्मान्तर मेँ भी अपना कल्याण हो सकेगा । जैसे राजकोष , प्रजा तथा सेना के अभाव मेँ राजा राजा नहीँ है , सुगंध के अभाव मेँ पुष्य पुष्प नहीँ है , जल के अभाव मेँ सरिता सरिता नहीँ है , उसी प्रकार ब्रह्मचर्य के अभाव मेँ मनुष्य मनुष्य नहीँ है । खुन क्या लाल ही होता है ? नहीँ-नहीँ , सफेद भी होता है । जो इस मानवी शक्ती , श्वेत रक्त ( ब्रह्मचर्य ) को नाश करता है , वह स्वयं की एवं देश की बरबादी करता है ।

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