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विद्यार्थियोँ के लिए ब्रह्मचर्य पालन अपरिहार्य - स्वामी रामतीर्थ जी के विचार

स्वामी रामतीर्थ जब प्रोफेसर थे , तो उन्होँने उत्तीर्ण और अनुत्तीर्ण विद्यार्थियोँ की नियमावली बनाई थी और उनके भीतर की दशा और आचरण से यह परिणाम निकाला था कि जो विद्यार्थि परीक्षा के दिनोँ या उसके कुछ दिनोँ पहले विषयोँ मेँ फँस जाते थे , वे परीक्षा मेँ प्राय: असफल होते थे , चाहे वर्ष भर श्रेणी मेँ अच्छे क्योँ न रहे होँ । और वे विद्यार्थी , जिनका चित्त परीक्षा के दिनोँ मेँ एकाग्र और शुद्ध रहा करता , वे अवश्य उत्तीर्ण और सफल होते थे । सचमुच , ब्रह्मचर्य से बुद्धि कुशाग्र तथा निर्मल होती है । शुद्ध ब्रह्मचर्य तीव्र स्मरण शक्ति की अपरिमित मात्रा मेँ वृद्धि करता है । पूर्ण ब्रह्मचारी की स्मरण शक्ति वृद्धावस्था मेँ भी सूक्ष्म तथा तेज होती है । जिस व्यक्ति मेँ ब्रह्मचर्य-शक्ति है , वही अपरिमित शारीरिक , मानसिक तथा बौद्धिक कार्य सम्पन्न कर सकता है । उसके मुख पर चुम्बकीय आभा होती है , जो खुद-ब-खुद लोगोँ को अपनी ओर खीँचती है । आयुर्वेद के निष्णात वैद्यशिरोमणि धन्वन्तरि जब अपने शिष्योँ को आयुर्वेद की सविस्तार शिक्षा दे चुके , तो उनके शिष्योँ ने पुछा कि आपकी इस शिक्षा को , आपके दिव्य गुणोँ को हम अपने जीवन मेँ आसानी से कैसे उतार सकेँगे । इसका कोई सुदृढ़ स्पष्ट उपाय बताने की कृपा करेँ ? गुरु ( धन्वन्तरि ) ने कहा- "सारी विद्याओँ , सारी योग्यताओँ एवं सभी सद्गुणोँ को विकसित करनेवाला एकमात्र ब्रह्मचर्य है । जितना तुम ब्रह्मचर्य व्रत को समझोगे , जितना तुम सदाचारी रहोँगे , उतना ही तुम्हारी आत्मशक्ति विकसित होगी । पूर्ण ब्रह्मचारी बनकर ही तुम सभी दिव्य गुणोँ को धारण करने मेँ सक्षम हो सकोगेँ ।" शांति , तेज , स्मृति , ज्ञान , स्वास्थ तथा आत्मा साक्षात्कार की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को ब्रह्मचर्य पालन अवश्य करना चाहिए । ब्रह्मचर्य ही सर्वोत्तम ज्ञान है । ब्रह्मचर्य ही सर्वश्रेष्ठ बल है । हमारा धर्मशास्त्र कहता है - "आयुस्तेजो बलं वीयं प्रज्ञा श्रीञ्च यशस्तथा । पुण्यञ्च सत्प्रिचत्वञ्च वर्धते ब्रह्मचर्यया ॥ अर्थात्‌ - ब्रह्मचर्य के अभ्यास से आयु , तेज , बल , पराक्रम , बुद्धि , धन , यश , पुण्य तथा सत्यप्रियता आदि की वृद्धि होती है । विद्यार्थियोँ ! तुम अपने को अकेला मत समझना । तुम्हारे साथ ब्रह्म मेँ विचरण करानेवाली अद्भुत शक्ति ब्रह्मचर्य है । जैसे चकमक मेँ आग है , बीज मेँ वृक्ष है , दुग्ध मेँ घृत है , वैसे ही तुम्हारे अन्दर तुम्हेँ महामानव बनानेवाला शुक्र मौजुद है । केवल तुम इसकी महिमा को समझो और इसे शुद्ध एवं सुरक्षित रखोँ ।

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