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बल , बुद्धि , यश आदि का नाशक अब्रह्मचर्य :

यह अनमोल मनुष्य शरीर विषय-वासनाओँ के लिए नहीँ है ; श्रृंगार के लिए नहीँ है ; अपने और दुसरे के चित्त मेँ वासना की आग लाने के लिए नहीँ , अपितु महान्‌ कार्य करने के लिये है । साधना करने के लिए और स्व पर कल्याण करने के लिए है । मेरे प्रिय भाइयो-बहनो ! यह प्राणभूत शक्ति वीर्य जो आपके जीवन का आधार है , जो प्राणोँ का प्राण है , जो आपके चमकदार नेत्रोँ मेँ चमकता है , जो आपके चमकीले कपोलोँ मेँ विकसित होता है , आपके लिए महान्‌ निधि है । यह वीर्य रक्त का सार है । जीवन का ओज है । जीवन का तेज है । यह वीर्य सौम्य , श्वेत , स्निग्ध , बल और पुष्टिकारक तथा गर्भ का बीज , शरीर का श्रेष्ट सार और जीवन का प्रधान आश्रय है । यह वीर्य सबके शरीर मेँ उसी प्रकार व्यास रहता है , जैसे दूध मेँ धी और ईख के रस मेँ गुड़ व्याप्त रहता है । जैसे दूध मेँ से मक्खन निकालने के लिए दूध को मथना पड़ता है और ईख मेँ से गुड़ निकालने के लिए ईख को पेरना पड़ता है , वैसे ही एक बूँद वीर्य को निकालने के लिए समग्र शरीर को मथना एवं निचोड़ना पड़ता है । जैसे दूध मेँ से धी निकालने के बाद और ईख मेँ से रस निकालने के बाद वे सार हीन एवं खोखले हो जाते हैँ , वैसे ही शरीर मेँ से वीर्य-शक्ति निकल जाने के बाद यह शरीर भी सार हीन , निस्तेज और खोखला हो जाता है । ऐसे वीर्यहीन प्राणी मृतप्राय हो जाता है । भगवान बुद्ध ने कहा - "यदि अपने को प्रिय समझे , तो अपने को सुरक्षित रखेँ । पण्डित तीनोँ अवस्थाओँ मेँ जागरण करेँ ।" ब्रह्मचर्य आश्रम बाकी सभी आश्रमोँ की आधार-शिला है । यह संजीवनी बूटी है । इस व्रत का व्रती बनने से शारीरिक , मानसिक , सामाजिक और आत्मिक उन्नति सरल हो जाती है । टेनीसॉन कहते थे - "दस नवयुवकोँ की शक्ति की शक्ति मुझमेँ है , क्योँकि मेरा ह्रदय पवित्र है । कामासक्त होकर न मैँने कभी प्रेम के चुम्बन का अनुभव किया और न ही किसी तरुणी के कोमल करोँ का स्पर्श ।" खुन क्या लाल ही होता है ? नहीँ-नहीँ सफेद भी होता है । जो कोई इस अनमोल मानवी शक्ति ब्रह्मचर्य को नष्ट करते हैँ , वे स्वयं भी नष्ट हो जाते हैँ । ब्रह्मचर्य से रहित मानव निर्बल होता है और उसका मन चलायमान बना रहता है । ऐसे व्यक्तियोँ का कोई भी संकल्प चाहे वे संसारी होँ अथवा वैरागी , दृढ़ नही पाता । महात्मा गाँधी कहते थे - "चरित्र ही जीवन का प्रधान स्तम्भ है ।" ब्रह्मचर्य विहीन मनुष्य का चरित्र स्वत: निम्नतर हो जाता है । ब्रह्मचर्यहीन मनुष्य को प्रतिष्ठा समाप्त हो जाती है , उसकी बात बेअसर हो जाती है । समाज के लोग उसे कमजोर और हेय के दृष्टि से देखते है । जो ब्रह्मचर्य को रक्षा नहीँ करते , उनके लिए आत्म-साक्षात्कार करना सम्भव नही , आत्म-साक्षात्कार का अधिकारी वही होता है , जो ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता है , मन , वाणी और आचरण से ब्रह्मचारी बनता है ।

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