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ब्रह्मचर्य का अनादर करनेवाले पृथ्वीराज चौहान , मुहम्मद रंगीला व अभिमन्यु आदि की दशाओँ का वर्णन :-

जीवन को ऊर्ध्वगामी बनानेवाली ऐसी बहुमूल्य वीर्य शक्ति को जिसने भी खोया , उसको कितनी हानि उठानी पड़ी , यह कुछ उदाहरणोँ के द्वारा हम समझ सकते हैँ । दिल्ली के अंतिम हिन्दु शासक महाराज पृथ्वीराज चौहान बार-बार ( 16 बार ) मुहम्मद गौरी को हराने के पश्चात्‌ सत्रहवीँ बार उसने हारे तो क्योँ ? इसलिए कि अंतिम युद्ध से पहले वे संयोगिता के साथ रंगलियाँ मनाने मेँ अपनी शक्ति को नष्ट कर बैठे थे । वह वीर्य शक्ति थी तो पृथ्वीराज विजयी होते रहे और वह शक्ति नष्ट हुई तो वे ही पृथ्वीराज चौहान उस मुहम्मद गौरी से हार गये । उसकी आँखेँ लोहे की गर्म सलाखोँ से फुड़वा दीँ मुहम्मद गौरी ने , और यह देश कई शताब्दियोँ के लिए परतन्त्र बन गया । केवल पृथ्वीराज चौहान ही क्योँ ! कितने ही दूसरे बड़े-बड़े योद्धाओँ और शासकोँ का भी यही हाल हुआ । दिल्ली मेँ ही एक अन्य शासक मुहम्मद रंगीला था । उसके ऊपर एक बार नादिरशाह ने कठोर आक्रमण किया , नादिशाह मार-काट करता हुआ आगे बढ़ता आया । ईरान से चला , अफगानिस्तान मेँ पहुँचा । अटक तक आ गया । ये सब प्रदेश दिल्ली मेँ बैठे हुए रंगीला बादशाह के ही थे । अटक को पार करके पंजाब मेँ दाखिल हुआ । मार-काट करता हुआ दिल्ली की ओर बढ़ता आ गया और इधर दिल्ली का रंगीला बादशाह यह कहकर भोग-विलास मेँ मस्त रहा कि अभी तो दिल्ली बहुत दूर हैं । जब नादिरशाह दिल्ली के पास पहुँचा , तो रंगीला बादशाह इसके शिवाय कुछ कर नहीँ सका कि उसके कदमोँ मेँ अपना सिर झुका देँ । महाभारत के युद्ध मेँ अभिमन्यु का प्रसंग आता है । वह अर्जुन का वीर पुत्र अभिमन्यु अकेले ही चक्रव्युह का भेदन करने निकल पड़ा । भीम भी पीछे रह गया । उसने जो शौर्य दिखाया , वह प्रशंसनीय था । बड़े-बड़े महारथियोँ के बीच वह अकेले रथ का पहिया लेकर ही युद्ध करता रहा , परंतु आखिर मेँ वह मारा गया । उसका मूल कारण यह था कि युद्ध मेँ जाने से पहले वह अपना ब्रह्मचर्य खण्डित कर चुका था । वह उत्तरा के गर्भ मेँ पाण्डव वंश का बीज डालकर आया था । इस छोटी-सी कमजोरी के कारण उसे तत्काल मृत्यु-मुख होना पड़ा । बाइबिल मेँ शूरवीरता मेँ अती प्रसिद्ध "सेम्सन" का दृष्टान्त आया है । जब उसने स्त्रियोँ के नेत्रोँ की विषमयी मदिरा को चखा , तो उसकी समस्त वीरता और शौर्य को उड़ते जरा भी देर न लगी । शास्त्र मेँ लिखा है कि मात्र एक मैथुन क्रिया भी मस्तिष्क तथा स्नायु तंत्र को पूर्णतया छिन्न-भिन्न कर डालती है । इससे दस दिनोँ की शारीरिक कार्य शक्ति व तीन दिनोँ के मानसिक कार्य शक्ति का व्यय होता है । अब आप ही विचारेँ कि यह प्राणाधार द्रव्य वीर्य कितना मूल्यवान्‌ है । ऐसे अनमोल बिन्दु का अपव्यय न कर हमेँ इसका बहुत सावधानीपूर्वक परिरक्षण करना चाहिये । वासना तो उस विषैली भिड़ ( एक कीड़ा ) के समान है , उस सुन्दर एवं मनोहर प्रतीत होनेवाले गुलाब के फूलोँ मेँ छिपा रहता है । जो उस फूल को हाथ लगाता है व नाक मेँ सटाता है , उसे वह तत्काल डंक मार देती है । लोग समझते हैँ कि हम सुन्दर-से-सुन्दर संसार के पदार्थोँ को भोग रहे हैँ , किन्तु वास्तव मेँ वह विष जो उनके अन्दर है , आपको भोगे बिना न रहेगा । जिनको लोग मजा या स्वाद कहते हैँ , वह अपना जहरीला असर किये बिना भला कब रह सकता है ? वासना उस किपांक विष फल के समान है , जो खाने मेँ मधुर होता है , सूँधने मेँ सुरभित होता है ; किन्तु जिसका परिणाम है - मृत्यु । अत: हमेँ वासना से उत्पन्न अकाल मृत्यु से बचने के लिए वासनामय जीवन से दुर रहकर ब्रह्मचर्य की समीपता ग्रहण करनी पड़ेगी । भगवान बुद्ध के अनुसार - "ब्रह्मचर्य का बिना पालन किये मनुष्य मछलियोँ से क्षीण जलाशय मेँ बढ़े क्रौश्च पक्षी की भाँति वृद्धावस्था मेँ चिंता को प्राप्त होते है ।" अब्रह्मचर्य से भरी जवानी मेँ ही आदमी बुढ़ा दिखने लगता है । जैसे पतंग अग्नि अथवा दीपक को पुष्प समझकर उसकी ओर भागता और उसमेँ जल मरता है , इसी प्रकार कामी व्यक्ति एक मिथ्या सुन्दर रूप की ओर यह सोचकर दौड़ता है कि उससे उसे सच्चा सुख प्राप्त होगा ; किन्तु परिणाम उल्टा होता है कि - कामाग्नि मेँ वह अपने आपको स्वाहा कर डालता है ।

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