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ब्रह्मचर्य के लिए विराट्‌ भावना 1.विराट्‌ भावना से ब्रह्मचर्य मेँ लाभ :-

प्रस्तुत प्रसंग ब्रह्मचर्य के लिए विराट्‌ भावना की है । अस्तु , जब साधक वासना की दीवार को तोड़कर अपने आपको ब्रह्मचर्य की आनंदभुमि मेँ ले आता है , तो संसार को वासना की आँखोँ से देखना बन्द कर देता है । दूषित भावनाओँ को तोड़ डालता है । संसार भर की स्त्रियोँ के साथ अपना एक सात्त्विक एवं पवित्र संबंध जोड़ लेता है । फिर वह जहाँ भी पहुँचता है , हर घर मेँ , हर परिवार मेँ , हर समाज मेँ सर्वत्र पवित्र भावनाओँ का वातावरण स्थापित करता है और वह समस्त्र भूमण्डल पर एक पवित्र स्वर्गीय राज्य की अवतारणा करता है । यह ब्रह्मचर्य की महान्‌ एवं विराट्‌ है । अबतक आप ब्रह्मचर्य संबंधी कई महत्वपूर्ण जानकारी से अवगत हो चुके हैँ । यह भी लिखा जा चुका है कि ब्रह्मचर्य का अर्थ - ब्रह्म मेँ , परमात्म मेँ विचरण करना । ब्रह्म महान्‌ है , अति बड़ा है । उसके जैसा विराट्‌ कौन हो सकता है ? वह सर्वोत्कृष्ट , अखण्ड , परम पवित्रतास्वरुप है और वह पवित्रता कभी मलिन नही होनेवाली है । एक बार वासना हट गई और जब शुद्ध स्वरुप प्रकट हो गया , तो फिर कभी उसपर वासना का प्रहार नहीँ होनेवाला है । इस प्रकार ब्रह से बढ़कर अन्य कोई पवित्र और महान्‌ नहीँ है । अस्तु ! उस परम पवित्र महान्‌ ब्रह्म मेँ विचरण करना या ब्रह्म के शुद्ध स्वरुप के लिए चर्या करना , ब्रह्मचर्य कहलाता है । जब साधक ब्रह्मचर्य की उपर्युक्त विशाल , विशद और महान्‌ भावना को लेकर चलता है , तभी वह ब्रह्मचर्य की साधना मेँ सफल हो सकता है । जब तक उसकी दृष्टि के सामने महान्‌ भावना और उच्च धारणा नहीँ है , तबतक वह चाहे कि मैँ ब्रह्मचर्य की साधना को सम्पन्न कर लूँ , तो वह ऐसा नही कर सकता । ऐसा कर पाना उसके लिए सम्भव नहीँ ; क्योँकि मनुष्य अपने आपको अज्ञानवश तुच्छ , नगण्य , दीन एवं हीन समझ लेता है , तब उसके जीवन का भयंकर पतन हो जाता है । विराट्‌ संकल्प की हीनता और मन की दीनता से मनुष्य अपनी शक्ति का , योग्यता का और क्षमता का विश्वास खो बैठता है । विचारक कहते हैँ कि मत विश्वास खोओ ; तुम खुद कल्पवृक्ष हो , तुम जैसा चिन्तन करोगे , वैसा ही बन जाओगे । इसलिए सदैव उत्तम चिन्तन करो । क्योँ क्षुद्र विचारोँ को मन मेँ लाकर दीन-हीन बनकर बैठे हो ? मन को हमेशा ऊँची-से-ऊँची आकांक्षाओँ से पूरित रखोँ । ऊँची आकांक्षाओँ से बहुत बड़ी चीज मिलेगी । विराट्‌ भावना के अभाव मेँ व्यक्ति किसी भी महान कार्य को सम्पन्न नहीँ कर सकता । ब्रह्मचर्य की साधना मेँ सफल होने के लिए इस विराट्‌ संकल्प शक्ति की नितान्त आवश्यकता है ; क्योँकि मनुष्य अक्सर जैसा विचारता है , वैसा ही बोलता है और जैसा बोलता है वैसा ही आचरण भी करता है । इसलिए मनुष्य अपनी छोटी-छोटी इच्छाओँ मेँ आबद्ध न होकर , मन मेँ हमेशा दिव्य भावनाओँ का प्रादुर्भाव करेँ । तभी वह अनंत सुख और असीम शान्ति का अनुभव कर सकता है । जिस साधक की भावनाओँ के सामने महान्‌ जीवन है , अर्थात्‌ सर्वोत्तम जीवन की कल्पना है , उसी की साधना महाना महान बनती है । जो महान्‌ है , वृहत्‌ है , वही आनन्दमय है । जो क्षुद्र है ; अल्प है , वह आनन्दमय कैसे हो सकता है ? अतएव , आध्यात्मिक अविनाशी आनन्द की प्राप्ती के लिए साधक मेँ वृहत धारणा एवं विराट्‌ भावना होनी चाहिए । इस विराट्‌ ( ब्रह्म ) की ओर साधक का गमन ही तो ब्रह्मचर्य है । अभिप्राय यह है कि ब्रह्मचर्य की साधना के लिए जीवन के सामने बहुत बड़ा आदर्श रखना है और जिसके सामने वह बृहतर आदर्श रहेगा , वही ब्रह्मचर्य मेँ अविचल निष्ठा प्राप्त कर सकेगा । जिस साधक के समक्ष जीवन की बहुत बड़ी कल्पना रहती है , वह उस बृहतर कल्पना को लक्ष्य बनाकर दौड़ता है और उसकी उपलब्धि के लिये अपनी सारी शक्ति लगा देता है । सारा-का-सारा जीवन उसके पीछे सहर्ष होम देता है । फलत: संसार की वासना उसे याद ही नहीँ आती है ।

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