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ब्रह्मचर्य के लिए विराट्‌ भावन 2. विशाल आदर्श मेँ ब्रह्मचर्य पालन सुलभ- वाचस्पति मिश्र जी की कथा : -

भारत के अन्यतम दार्शनिक वाचस्पति मिश्र के विषय मेँ एक प्रसिद्ध प्रसंग है । उनका विवाह हुआ , तब अगले दिन ही उन्होँने "ब्रह्मचर्य" के शांकर भाष्य पर टीका लिखना प्रारंभ कर दिया । वे दिन-रात टीका लिखते और हमेशा गम्भीर विचारोँ मेँ डूबे रहते ; परंतु उनकी सुशील और चतुर नवोढ़ा पत्नी ने उनके इस महान्‌ कार्य मेँ कुछ भी बाधा न दी । वह तो और अधीक सेवा मेँ रत रहने लगी । जब दिन छिपने को होता , तब अन्धकार को दूर करने के लिए वह दबे पैरोँ आकर दीपक जला जाती । मिश्रजी तन्मय भाव से लिखने मेँ संलग्न रहते और उन्हेँ पता ही न चलता कि दिपक कब और कौन जला गया है । इस प्रकार बारह वर्ष निकल गये और यौवन की वह तुफानी हवा , जो ऐसे समय मेँ दो युवक-युवतियोँ के ह्रदय मेँ बरबस बहने लगती है , वहाँ न बह सकी । जब टीका की समाप्ति का समय आया , तब एक दिन ऐसा हुआ कि दीपक जल्दी ही बुझ गया । जब पत्नी उसे फिर जलाने आई , तो वाचस्पति मिश्र ने प्रकाश मेँ देखा कि वह एक तपस्विनी के रूप मेँ रह रही है और उसने अपने जीवन को दूसरे ही रूप मेँ ढाल दिया है । शरीर कृश है , अलंकार-हीन है , वस्त्र भी साधारण है । आखिर उन्होँने पूछा - "तुमने ऐसा जीवन क्योँ बना रखा है ?" पत्नी ने प्रसन्न भाव से कहा -: "आपकी पवित्र उद्देश्य की पूर्ती के लिए मैँ बारह वर्ष से यह कर रही हूँ ।" मिश्रजी चकित रह गये और गद्गद स्वर मेँ बोले - : "सचमुच तुम्हारी साधना के बल से ही मैँ इस महान्‌ ग्रन्थ को पूरा कर सका हूँ । यदि मैँ संसार की वासनाओँ मेँ फँसा होता , तो कुछ भी नही कर सकता था । किन्तु अब वह चीज लिखी है , जो तुमको और मुझको अमर कर देगी । मैँ इस टीका का नाम तुम्हारे नाम पर "भामती" रखता हुँ ।" वाचस्पतिजी ने "ब्रहसूत्र" के शांकर भाष्य पर जो "भामती" टीका लिखी है , वह आज भी विद्धानोँ के लिए एक गम्भीर चिन्तन का विषय है । अच्छे-से-अच्छे विद्धान भी पढ़ते समय उसमेँ इस प्रकार डूबे रहते है कि वासना क्या , संसार का कोई भी प्रलोभन उन्हेँ उलझन मेँ नही डाल सकता ; तन्मयता बराबर बनी रहती है ; मन इधर-उधर नहीँ भटकटा । आशय यह है कि वाचस्पति जी के सामने यदि वह ऊँची दार्शनिक भावना न होती , और ऊँचा संकल्प न होता , तो क्या आप समझते हैँ कि वे इतनी महान्‌ कृति जगत्‌ को भेँट कर सकते थे ? हर्गिज नहीँ । वे भी साधारण व्यक्तियोँ की तरह यौवन की आँधी मेँ , वासना के वन मेँ भटक जाते और अपनी प्रतिभा को योँ ही समाप्त कर देते । जिस महत्वपूर्ण कार्य के प्रति एकनिष्ठता नहीँ , उसे जीवन मेँ उच्चता प्राप्त नहीँ होती । जिसके जीवन मेँ ऊँची भावना नहीँ है , जिसने ज्ञान की उपासना मेँ अपने मन को नहीँ रँग लिया है , उसका ब्रह्मचर्य कैसे चमकेगा ? उसकी साधना सफल नहीँ हो सकती । उसके लिए तो निष्ठा के साथ जीवन का कण-कण लगाना पड़ता है । यदि हम अपने जीवन को अरिष्टनेमि और महावीर , लक्ष्मण और हनुमान , भीष्म और बुद्ध के जीवन जैसे ढाँचे मेँ ढालेँगेँ , तो देश और समाज तथा स्वयं का कल्याण होना कोरा स्वप्न ( कल्पना ) मात्र ही रह जाएगा । असली जीवन-तत्त्व ब्रह्मचर्य की साधना मेँ ही है । ब्रह्मचर्य की साधना का अर्थ है - "बृहतर आदर्श ।" यह बृहतर आदर्श और बृहत्‌ कल्पना हमारे जीवन मेँ , चाहे सामाजिक दृष्टि से या फिर राष्ट्रीय दृष्टि से भी जरूर आनी चाहिए ; क्योँकि उसके आने पर ही ब्रह्मचर्य की प्राणप्रदायिनी साधना संजीव हो सकती है । उद्धरण "जहाजोँ को डुबा दे जो , उसे तूफान कहते हैँ । जो तूफानोँ से टक्कर ले , उसे इन्सान कहते हैँ ।। किसी कि बुराई देखना , मानो साथ-साथ अपनी बुराई प्रकट करना है । अगर अपनी प्रशंसा सुनना हो , तो किसी की बड़ाई करके देख लो । -आत्मशोधक जो मनुष्य अपना मन किसी एक विशुद्ध एवं उच्च ध्येय पर एकाग्र कर देता है , उसके मन मेँ कभी भी काम-विकार , विकल्प एवं वासनामय बुरे विचार उत्पन्न नहीँ होने पाते । - आत्मशोधक

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