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काम की प्रबलता एवं उसका रूपान्तरण 1. प्रबलकाम की विस्तृत व्याख्या तथा एक पण्डित की कहानी : -

"काम काम सब कोई कहै , काम न चीन्है कॅय । जेती मन की कल्पना , काम कहावै सोय ॥" - कबीर "काम" वस्तुत: मन मेँ उठनेवाले अनेक संकल्प-विकल्पोँ का ही नाम है । किन्तु यहाँ खास कर "काम" शब्द कामदेव ( मैथुन की इच्छा ) के लिए दर्शाया गया है । इस काम की प्रबलता का बखान करते हूए भर्तृहरी जी महाराज ने "श्रृंगार शतक" मेँ क्या ही अच्छा कहा है-"दुर्बल , काना , लँगड़ा , कनकटा , पुँछकटा , फोड़ोँ से भरा , पीब भरा , सैकड़ोँ कीड़ोँ से व्याप्त , भुख से व्याकुल , अति बूढ़ा , मिट्टी के घड़े मेँ फँसे हुई गर्दनवाला भी कुत्ता , कुत्ती के पीछे-पीछे लगा ही रहता है । ठीक ही है कामदेव मरे को भी मारता है ।" अलूक दिन मेँ नहीँ देख सकता और काक को रात मेँ नहीँ सूझता ; कितनी विचित्र बात है कि कामान्ध मनुष्य न दिन मेँ देख पाता है और न रात मेँ ही । जबकि वायु , जल , और पत्तोँ को खानेवाले विश्वामित्र और पराशर जैसे महर्षि भी काम के प्रकोप से बच नहीँ पाये , तो सर्व साधारण की बात ही क्या ! इसलिये आचार्च मनुजी महाराज ने कहा है - "मात्रा स्वस्त्रा दुहित्र वा न विविक्तासनो भवेत्‌ । बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ ( मनुस्मृति 2/2/5 ) माँ , बहन और पुत्री के साथ भी व्यक्ति को एकांत मेँ नहीँ बैठना चाहिये ; क्योकि मनुष्य की इन्द्रियाँ बहुत बलवान्‌ होती हैँ । वे विद्वानोँ के मन को भी समान रूप से ही अपने वेग मेँ खीँच ले जाती हैँ । इस पर एक कथा है कि एक कोई पण्डितजी अपने मित्र से इस विषय पर बात कर रहे थे कि मनुष्य का शीघ्र पतन किस कारण को पाकर हो सकता है । मित्र ने कहा- एकांत मेँ कुसंग ( स्त्री-संग ) मिलने पर पर मनुष्य शीघ्र पतित हो सकता है । परंतु यह बात पण्डितजी को ठीक नहीँ जँची ; क्योँकि उसे अपने पाण्डित्य , विद्या , बुद्धि पर गर्भ था । मित्र ने उसे पुन: समझाया और कहा - पण्डितजी ! यह कामशक्ति इतनी प्रबल है , ये हमारी इन्द्रियाँ इतनी बलवती हैँ कि मनुष्य को क्षण मात्र भी एकांत व कुसंग मिलते पतित करा देती हैँ । पण्डितजी ने फिर भी नहीँ मानी । उनकी युवति इन बातोँ को आड़ ( परदे के पीड़े ) से खड़ी होकर सुन रही थी । लड़की ने पण्डितजी से कहा कि पिता जी ! यह बात बिल्कुल सत्य है कि विद्वान व्यक्ति भी एकांत व कुसंग पाकर शीघ्र गीर जाता है । किँतु पण्डितजी की समझ मेँ अभी भी नहीँ आई । लड़की ने सोचा कि एक दिन इनको सीख देनी चाहिए । लड़की की ससुराल उसी ग्राम मेँ थी । एक दिन लड़की पण्डितजी के यहाँ थी । समय पाकर शाम को उसने श्रृंगार किया । कुछ रात बीत गई । वह पिता के एकांत कमरे मेँ गई और उनसे नाज-नखरोँ के साथ बात करनी लगी । पंडितजी के मन मेँ कुछ मोह उत्पन्न हुआ और कहा कि लाओ शतरंज खेली जाय । लड़की शतरंज खेलने लगी और साथ-साथ उसका हाथ का फैलाना , भाव-भंगिमा करना , नेत्र चलाना होता रहा । धीरे-धीरे पंडीतजी की इन्द्रियाँ विवश हो गई । उन्होँने लड़की को पकड़ना चाहा , लड़की ने तुरंत दीपक बुझा दिया । उसने पहले ही उस कमरे मेँ नौकरानी को छिपा दिया था । दीपक बुझते ही नौकरानी पण्डित के सामने आ गयी लड़की धीरे से ससुराल चली गई । इधर पण्डितजी ने नौकरानी को अपनी लड़की समझकर पकड़ लिया , और जो मन मेँ आया , किया । जब पतन हो गया , तो नशा उतरते ही घोर पश्त्ताप हुआ , परंतु प्रकाश जलाने पर शय्या पर नौकरानी मिली , इसलिए उन्हेँ कुछ संतोष हुआ । दुसरे दिन लड़की से मिलने पर पण्डितजी नतमस्तक हो गये और यह ह्रदय से स्वीकार किया कि मनुष्य की इन्द्रियाँ सचमुच अति प्रबला हैँ । वह विद्धानोँ को भी एकांत व कुसंग मिलते ही क्षण मात्र मेँ आकर्षित कर लेती हैँ । जिस प्रकार लोमड़ी झाड़ी मेँ छिपी रहती , उसी प्रकार वासना मन के अध:स्तर तथा कोनोँ मेँ छिपी रहती है , जो कभी मन मेँ आ सकती है । राजा भर्तृहरि ने "वैराग्य शतक" मेँ लिखा है - "हे पिता ! सृष्टि के आरंभ से मैँने सारा संसार छान डाला , पर न ऐसा कोई सुनने मेँ आया , न देखने मेँ आया जो विषयरूपी हथिनी के अतिरूढ़ और मूढ़ अभिमान से उन्मत्त अन्त:करणरूपी हाथी को समयरूपी रस्सी मेँ रोक ले ।" कुछ वीर मदमस्त गजराज को मारने मेँ सिद्धहस्त हैँ तो कुछ सिँह को मारने मेँ ; परंतु मैँ दृढ़ता-पूर्वक कह सकता हूँ कि कामदेव के घमण्ड को खण्डित करनेवाला वीर शायद ही कोई होगा । इस संसार की सबसे बड़ी कौन शक्ति है ? क्या आप कल्पना कर सकते हैँ कि इस सम्पूर्ण विश्व को जीतनेवाला पुरुष भी उस शक्ति के आगे पिघल जाता है , जैसे आग के सामने मोम । वह शक्ति है कामदेव की । जब व्यक्ति कामवासना के अधीन हो जाता है , तो उत्तेजना और कामवेग उसकी सारी समझ , बुद्धि को नष्ट कर डालते हैँ । उसको अभिभूत कर लेते हैँ तथा उसे सर्वथा असहाय एवं बिल्कुल अंधा बना डालते हैँ , तब वह जिप्सी ( बदसूरत ) महीला के रूप-रंग मेँ भी हेलेन ( अत्पन्त सुन्दरी ) के सौन्दर्य का दर्शन करने लग जाता है । नि:संदेह , वासना अंधी होती है । कामी व्यक्ति रूप-कुरूप , वयस्क-वृद्ध कुछ नहीँ देखता , वह तो जिन्दा-मुर्दे की पहचान कर ले - यही काफी है । क्या स्त्री , क्या पुरुष - काम ने किसको बदनाम नही किया । काम विकार का शिकार हो मनुज अपनी मर्यादा को "मनुजाद" बन जाता है । फलत: अनुजा और तनुजा करने लग जाता है । इस कठोर काम ने तो इन्द्र तक को भी अहल्या के साथ छेड़छाड़ करने को विवश कर दिया और तिष्यरक्षिता को कुणाल जैसे साधु की भी आँख निकालवाने को मजबूर कर दिया था । काम की कितनी प्रबलता बखानी जाय , इसकी चपेट मेँ ब्रह्मा , शिव और नारद मुनि भी लपेट लिये जाते है । यह तो पुरुष वर्ग की बात हुई । स्त्री जाति मेँ भी द्रौपदी जैसी सती नारी , जिसको पाँच पति होने पर भी अपने पातिव्रत धर्म पर नाज था , समाज और लोक-परलोक की लाज खो कर्ण की प्यारी बनने की मन ही मन तैयारी कर रही थी । बलिहारी है उस मुरारी की , जिसने उसकी ढोलवत्‌ पोल को सबसे सामने खोल दिया ।

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