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काम की प्रबलता एवं उसका रूपान्तरण 2. काम-सेवन की निन्दाव राजा ययाति का दृष्टान्ट - :

मनुस्मृति कहती है - न मांस भक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने । प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला॥56॥ "मांस-भक्षण करने , मद्य ( शराब आदि ) पीने तथा मैथुन करने मेँ प्राय: जीवोँ की प्रवृति है और अज्ञानवश इसमेँ दोष नहीँ मानते है ; परंतु इन सबका परित्याग महाफल देनेवाला है ।" धर्मशास्त्र मेँ काम-सेवन ( मैथुन , सेक्स का प्रयोग ) जहर खाने के सदृश बताया गया है । सबसे अधीक असर करनेवाला जहर भी काम की तुलना मेँ कोई विष नहीँ हैँ ; क्योँकि यह साधारण विष तो मात्र एक शरीर को मारता है , जबकि काम-भोग का संस्कार तो आनेवाले अनेक शरीरोँ को भी कलुषित ( मैला ) करता है । वासना उस किँपाक विष-फल के समान है , जो खाने मेँ मधुर होता है , सूँधने मेँ सुरभित होता है ; किंतु जिसका परिणाम है - मृत्यु । हे विद्वाणोँ ! क्षण मात्र के लिए सुख देनेवाली काम-वासना से अपने को हटा लो । करुणा , मैत्री और प्रज्ञारूपी स्त्रियोँ से संगम करोँ ; अंत मेँ नरक मेँ जाने पर वह मुक्ताहारवाला नितम्ब मण्डल तुम्हारी रक्षा नहीँ कर सकेगा । बद्धो हि को यो विषयानुरागी का वा विमुक्ति विषये विरक्ति: - आचार्य शंकर बद्ध कौन है ? जो विषयोँ मेँ आसक्त है , वही वस्तुत: बद्ध है । विमुक्ति क्या है ? विषयोँ से वैराग्य ही मुक्ति एवं मोक्ष है । वासना का वार प्राय: निर्मम , आशाहीन , आधारहीन एवं दुर्बल प्राणियोँ पर ही होता है ; चोर की अँधेरे मेँ चलती है , उजाले मेँ नहीँ । हे मूढ़ प्राणी ! जो तुने संसार मेँ भ्रमण करते-करते इस अमूल्य मनुष्य-भव ( जन्म ) को पाया है , तो तू वह काम कर जिससे कि तेरी कामरूपी ज्वाला सदा के लिए नष्ट हो जाए ; सदा के लिए शान्त हो जाए ; क्योँकि काम से शोक उत्पन्न होता है , काम से ही भय उत्पन्न होता है । काम से मुक्त को शोक नहीँ , फिर भय कहाँ से ? राजा ययति बुढ़े हो गये थे , पर संसार के पदार्थोँ से उनका मन तृप्त नहीँ हुआ था । उपभोग की इच्छा और बलवती होती गयी । एक दिन अपने आज्ञाकारी पुत्र (पुरु) से कहा - बेटा ! तुम अपनी तरुणाई मुझे दे दो और मेरा बुढ़ाया स्वयं ले लो । मुझे और अभी ... । पिता की बात सुनते ही पुत्र ने पिता की इच्छा को पूरा किया । देखते ही देखते महाराज तरुण हो गये और राजकुमार बुढ़ा हो गया । इसपर तुलसीदास ने बड़ा अच्छा लिखा है - "तनय ययाति यौवन दयऊ । पितु तेहि अयस न भयऊ ॥" पुत्र असमय ही वार्द्धक्य ( बुढ़ापे ) का बोझा ढोता रहा और पिता तरुणाई का स्वाद लेता रहा । एक दिन महाराज ने पुत्र को बुलाया और उसका यौवन लौटाते हुए बोला - वत्स ! मैँने तो सोचा था कि तुम्हारी तरुणाई लेकर मैँ वासनाओँ और वैषयिक इच्छाएँ पूरी कर लुँगा , पर मैँ पाता हुँ कि दिन-व-दिन प्रतिपल प्रतिक्षण मेरी इच्छाएँ और बलवती होती जा रही हैँ । "न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्पति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवा भिवर्धते ॥" ( भागवत ) विषयोँ की कामना उन विषयोँ के उपभोग से कभी शांत नहीँ होती । अपितु , धी की आहुति पड़ने से अग्नि की भाँति वह अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है । अत: तुम अपनी जवानी वापस ले लो । राजा भर्तृहरि ने क्या सुंदर कहा है - "भीख माँगकर खाया वह भी रूखा-सूखा और दिन मेँ एक बार । सोना भी पृथ्वी पर ही । परिवार भी अपना शरीर ही । पुरानी पटी गुदड़ी ही कपड़ा , ऐसी अवस्था मेँ रहते हुए भी मनुष्य विषय-वासना को नहीँ छोड़ते । आश्चर्य है ? महात्मा गाँधी कहते थे - "ताकत के द्वारा विश्व पर विजय प्राप्त करने की अपेक्षा उच्छृंखल वासना पर विजय पाना कठिन है ।"

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