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काम की प्रबलता एवं उसका रूपांतरण 3. ऊर्ध्वरेता पुरुष -कालीदास एवं तुलसीदास जी का वर्णन - :

कहा जाता है कि महाकवि कालिदास का जीवन पहले बहुत ही विषय-वासनामय था ; किन्तु जब उसने अपनी काम-शक्ति का शोधन कर लिया , तब उसने "शकुन्तला" एवं "मघदूत" जैसी श्रेष्ठ कृतियाँ संसार को समर्पित कर दीँ । मीराबाई के संगीत मेँ जो माधुर्य और सौन्दर्य है , वह कहाँ से आया ? कहीँ बाहर से नहीँ , बल्कि वह भी मानसिक शक्ति के शोधन से ही प्रकट हुआ था । संत सूरदासजी का मन पहले चिन्तामणि वेश्या पर आसक्त था और वे उसके प्रेम को पाने के लिए सदा लालायित रहते थे । किन्तु वह दशा उनके जीवन की उत्तम दशा न थी । एक दिन उन्होँने अपने मन की इस अधोदशा पर विचार किया , उनकी प्रसुप्त आत्म-चेतना जागृत हो गई और उन्होँने अपनी मानसिक शक्ति का शोधन करके अपने मन को कृष्णभक्ति मेँ डुबोकर जो भक्तिमय मधुर पद्य लिके हैँ , वे संसार के साहित्य मेँ बेजोड़ माने जाते हैँ । उनके भक्तिमय संगीत की स्वर-लहरी चारोँ दिशाओँ मेँ एवं भारतीय संस्कृति के कण-कण मेँ रस चुकी है । गो॰ तुलसीदास जी अपनी पत्नी रत्ना के वासनामय प्रेम मेँ इतने विह्वल थे कि उसके पास पहुँचने के लिए रात्री के अंधकार मेँ एक भयंकर सर्प को भी वे रस्सी समझ लेते हैँ । कल्पना कीजिए कि उस कामातुर मन के विकल वेग की । किन्तु आगे चलकर वत्ना के मधुर उपालम्भ से उनके जीवन की दिशा ही बदल जाती है । कामातुर तुलसीदास संत गोस्वामी तुलसीदास बन जाते हैँ । काम का भक्त तुलसी राम का परम भक्त बन जाता है । तुलसी ने अपनी मानसिक शक्ति का शोधन करके अपनी काम शक्ति का रूपांतरण एवं ऊर्ध्वकरण करके जो कुछ साहित्य की श्रेष्ठतम कृतियाँ संसार के समक्ष प्रस्तुत की हैँ , वे निश्चय ही बेजोड़ और बेमिसाल हैँ । तुलसीदास जी सदा के लिए अमर हो गए । गृहस्थ होते हुए भी इस ब्रह्मचर्य शक्ति को परिमार्जित और सृजनात्मक दिशा देकर बोलते समय काँपनेवाले मोहन दास अपनी आवाज से करोड़ोँ लोगोँ मेँ प्राण फूँकनेवाले महात्मा गाँधी हो गए । इस ब्रह्मचर्य का शोध ( रूपांतर ) करके तो पिँगल- जैसी वेश्या का भी उद्धार हो गया ।

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