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काम की प्रबलता एवं उसका रूपान्तरण 5. राजा भर्तृहरि के जीवन-परिवर्तन का उल्लेख - :

राजा भर्तृहरि के राज्य मेँ किसी पुरुष को अमर फल कहीँ से मिला ऐसा फल , जिसे खानेवाला बहुत देर तक जीवित रहे , नवयुवक बना रहे , उसे कोई रोग न हो । उस पुरुष ने सोचा - : मैँ साधारण आदमी हूँ । इस फल को खाकर बहुत दिन तक जी भी लिया , तो इससे लाभ क्या होगा ? इसे महाराज भर्तृहरि जी को दे देना चाहिए । फल को लेकर वह महाराज के पास पहुँचा और बोला - : महाराज ! यह अमर फल है , इसे खानेवाला बहुत दिन तक जीवित रहता है । उसकी आयु बहुत लम्बी हो जाती है । वह सदा नवयुवक रहता है , उसे कोई रोग नहीँ होता । मैँ यह आपके लिए लाया हुँ । महाराज ने उसे परितोषिक दिया । फल लेकर अपने पास रख लिया । कुछ समय पश्चात्‌ खाने लगे , तो विचार आया कि मैँ इस फल खाकर बहुत दिनोँ तक जिऊँगा , युवक भी रहूँगा सही ; परंतु जिस रानी से मैँ इतना प्यार करता हूँ , वह बुढ़ी हो जायेगी , फिर मैँ जिऊँगा किसलिए ? नहीँ । यह फल महारानी को दूँगा , ताकि वह सदा युवती बनी रहे । यस सोचकर उन्होँने वह फल अपनी महारानी को दे दिया और उसे गुण भी बता दिये । महारानी ने उस फल को रख लिया । उसको मित्रता थी अपने मंत्री के साथ । उसने सोचा - मैँ खाकर इसे क्या करूँगी ? जिसे मैँ प्यार करती हूँ , यह उसे दे दूँगी । और जब मंत्री उसके पास आया , तो महारानी ने वह फल उसे दे दिया , उसके गुण बताए और बोली कि देखो , मैँ तुम्हेँ कितनी चाहती हूँ । मंत्री ने फल को अपनी जेब मेँ रख लिया । उसकी मित्रता एक बाजारी औरत ( वेश्या ) से थी । वह औरत उसे बहुत अच्छी लगती थी । रात को वह उस स्त्री के पास गया तो वह फल उसे दे दिया । और बोला इसको खाने से तुम्हारी आयु लम्बी हो जायेगी । तुम सदा आज की तरह युवती और सुन्दरी बनी रहोगी । तुम्हेँ कभी कोई रोग नहीँ होगा । इसकोँ अमर फल कहते हैँ । उस स्त्री ने फल को लिया , अपने पास रखा । मंत्री चला गया , तो उसने सोचा - मेरा जीवन तो पाप का जीवन है । जितने अधिक दिनोँ जिऊँगी , उतने ज्यादा पाप करूँगी । इस तरह तो घोर नरक जाग उठेगा मेरे लिये । नहीँ , यह फल मैँ नहीँ खाऊँगी । यह फल तो किसी ऐसे महापुरुष को देना चाहिए , जो दुनिया को भला करता हो । और मन-ही-मन मेँ उसने कहा - महाराज भर्तृहरि से ज्यादा बड़े सज्जन और महान्‌ पुरुष कौन हैँ ? वे सबका भला करते हैँ । सारी प्रजा को सुखी रखते हैँ । सबको न्याय देते हैँ । उन्हीँ को यह फल दूँगी । दूसरे ही दिन वह महाराज के दरबार मेँ पहुँची और हाथ जोड़कर बोली - महाराज ! यह अमर फल है , इसके खानेवाले की आयु बहुत लम्बी हो जाती है । वह सदा युवा रहता है । उसे कोई रोग नहीँ होता , यह मैँ आपके लिए लायी हुँ । महाराज भर्तृहरि ने उस फल को देखा , पहचाना , आश्चर्य से बोला - यह फल तुम्हेँ कहाँ से मिला ? वेश्या ने कहा कहीँ से मिल गया महाराज ! यह आपके योग्य है , महाराज बोले - सुनो ! यह चोरी की वस्तु है । सच बोलो - कहाँ से मिला तुम्हेँ यह फल ? नहीँ तो तुम्हे चोरी के अभियोग मेँ बन्दी बना लिया जायेगा । उसने डरी हुई आवाज मेँ कहा - महाराज ! मैँ नहीँ जानती कि यह चोरी की वस्तु है या नहीँ , यह फल तो मुझे आपके मंत्रीजी ने दिया था । महाराज ने मंत्री को बुलवाया । गरजती आवाज मेँ बोले - यह फल जो तुमने इस स्त्री को दिया , तुम्हारे पास कैसे आया ? मंत्री ने सिर झुकाकर काँपती आवाज मेँ कहा - यह न पुछिये महाराज ! मैँ नहीँ बता सकता । महाराज कड़क कर बोले - नहीँ बता सकते तो सुनो , तुम्हारी गर्दन उड़ा दी जायेगी । कैसे आया तुम्हारे पास ? मंत्री ने और भी झुककर कहा - मुझे यह आपकी महारानी ने दिया था । अब भर्तृहरि जी की आँखेँ खुलीँ । दु:ख के साथ उन्होँने कहा - "जिसे मैँ प्यार करता हूँ , वह किसी दूसरे से प्यार करती है । जिसे वह प्यार करती है , वह किसी और को चाहता है । और जिसे वह चाहता है , वह किसी कारण विशेष से और को । कैसी दुनिया है यह ?" और वैराग्य के आँसू बहाते हुए बोले - "धिक्‌ तं च तां च मदनं च इमां च मां च ।" धिक्कार है उस पुरुष को , उस स्त्री को तथा उस वासना को , जो सबको अंधा किये देती है ! धिक्कार है इन सबको और धिक्कार है मुझको भी । महाराज भर्तृहरि ने इसकी वास्तवितका को समझा , तो उनकी आँखे खुली । उन्हेँ वैराग्य हो गया । कहा जाता है कि उसके बाद राजा भर्तृहरि ने न केवल वासनामय जीवन ही त्यागा , बल्कि राजपाट भी त्याग कर वे गुरु गोरखनाथ जी महाराज की शरण मेँ जाकर ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करने लगे । वे अच्छे महात्मा बन गये । उन्होँने सुन्दर-सुन्दर ग्रन्थ लिखे , जैसे - श्रृंगार शतक , वैराग्य शतक , नीति शतक और वाक्यपदीप आदि । वैराग्य शतक मेँ वे एक जगह लिखते हैँ कि पहले जिस जवानी मेँ कामदेव-रूप तिमिर नाम के नेत्र रोग की व्यप्ति से विवेक नष्ट होकर सारा संसार स्त्रीमय दिखाई देता था , अब इस समय तिमिरमय नेत्र को दूर करने मे समर्थ तत्त्वज्ञानरूय अंजन को लगाने से वही दृष्टि त्रिभुवन को ब्रह्ममय समझती है । आपने देखा कि संसार मेँ सच्चे प्यार दुर्लभ है यहाँ तो सिर्फ भोग-विलास का जीवन है । अगर सच्चे प्यार करने चाहते हो तो ईश्वर से करोँ क्योँकि इस प्रेम ईश्वर हमारी रक्षा करेँगे परंतु संसारिक प्रेम मेरी प्रेमिका कोई प्रयास नही कर सकेगा ।

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