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काम को प्रबलता एवं उसका रूपान्तरण 6. मौत-स्मरण से वासना-क्षय - : पूज्य गुरुदेव महर्षि मेँहीँ परमहंस...

इस संबंध मेँ हमारे पूज्य गूरुदेव के विचार कुछ ज्यादा उत्तम व निराले हैँ । वे कहते थे - "जो अपनी मौत को प्रत्यक्ष की तरह देखते हैँ , उनकी सब सांसारिक भोग-वासनाएँ समाप्त हो जाती हैँ ।" सच यही - मौत क्या चीज है , कभी गौर से सोचा नहीँ ॥ लोगोँ के लिए बहुत रोया , पर खुद के लिए कोई रोता नहीँ। मौत ध्रुव , निश्चित है , इसमेँ कोई धोखा नहीँ ॥ मौत जो याद रखता , उसका रब कभी खोता नहीँ । मौत-स्मरण से कभी भी , दुष्कर्म कोई होता नहीँ ॥ मौत को जिसने जान लिया आत्म शोधक । उसकी फिर मौत , कभी होती नहीँ ॥ सचमुच यह बड़ी विलक्षण व बिल्कुल दुरुस्त बात है । अक्सर व्यक्ति मौत को विस्मरण कर ही कुकृत्य व भोग-विलास जैसे कर्म करते हैँ । जिसे हर वक्त खुद की मौत का स्मरण है , उसमेँ काम-वासना उत्पन्न ही नही होती । एक बार किसी व्यक्ति ने एक ब्रह्मचारी महात्मा से , जिनका शरीन हष्ट-पुष्ट तथा सुन्दर था , पुछा - महाराज ! आप अपने मन को काम-वासना को कैसे रोकते हैँ ? महात्मा ने कहा - "अरे भाई ! यह प्रशन तो रहने दो , तुम्हारे शरीर के लक्षण से तो ऐसा प्रतित होता है कि तुम कल प्रातः चार बजे मर जाओँगे ।" महात्मा की यह बात सुनकर युवक घबरा गया । वह घर गया । आधी रात हुई । उसकी युवति सुन्दरी पत्नी आयी , उसने पति से छेड़खानी की परंतु पुरुष को तो मौत का भय सवार था कि अब हमेँ दो-चार घण्टे मेँ चल बसना है । अतः उसके मन मेँ कोई काम-वासना नही उठी । प्रातः हुआ । उसकी मृत्यु नहीँ हुई । वह महात्मा के पास गया और कहा - "महात्माजी ,मैँ तो मरा नहीँ , आपने मेरे मरने की बात क्योँ कही थी ? महात्मा ने कहा - "अरे भाई ! यह प्रशन छोड़ो , यह बताओ कि कल से अब तक तुम्हारे मन मेँ कितनी बार काम-विकार आया ?" युवक बोला - "महाराज ! मुझमेँ तो मृत्यु का डर समाया था । काम-विकार तो मन मेँ एक बार भी नहीँ आया ।" महात्मा ने कहा - बस ! मेरा काम-विकार मेँ न पड़ने का कारण यही है कि मुझे हर समय तुम्हारी मृत्यु होने की अवधि बतायी थी , मृत्यु के समय मेँ लगभग 12 घंटे का अंतर था । किन्तु मुझे तो अपनी मृत्यु के विषय मेँ कोई निश्चित अवधि की भी जानकारी नहीँ , अभी इसी समय भी आ सकती है । निकला हुआ श्वास भी न लौटे , क्या विश्वास ! अतएव मैँ अपने शरीर को हर समय मृत्यु के मुख मेँ पड़ा हुआ देखकर कामादिक विकारोँ से रहित रहता हूँ । दरअसल जो हमेशा मौत को याद रखेगा , वह ईश्वर-भक्त भी होगा अर्थात्‌ भगवान्‌ को भी याद करता होगा और अच्छे ईश्वर-भक्त के मन मेँ काम-विकार कभी पटकटे नहीँ तथा ऐसे महापुरुष ( ईश्वर-भक्त ) अवश्य ही ऊर्ध्वरेता पुरुष भी होते हैँ । भला उनके अलावा काम-वासना का रूपान्तरण करने की समुचित विधि और कौन जान सकता है ? वास्तव मेँ वे काम-वासना को ऊर्ध्वमुखी करके ही ऊर्ध्वरेता पुरुष कहलाते हैँ । अतः मनुष्य के मन मेँ जो काम-वासना है , उसका बलात्‌ ( हठात्‌ ) बाहरी दबाब से दमन न किया जाए । दमन आखिर दमन ही है । दमन करने से वह मूलतः नष्ट नहीँ होती , अपितु निमित्त पाकर उग्र विकारोँ के रूप मेँ पुनः भड़क उठती है । उसपर नियन्त्रण करने का सबसे अच्चा उपाय यही है कि विवेक के प्रकाश मेँ ऊर्ध्वीकरण ( रूपान्तरण ) और शोधन किया जाए ।

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