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काम की प्रबलता एवं उसका रूपान्तरण 7. काम शक्ति का रूपान्तरण करने की सुन्दर विधि -:

काम शक्ति का रूपान्तरण करने की सुन्दर विधि -:

मनोविज्ञान के पण्डितोँ का भी यही विचार है कि प्रत्येक मनुष्य अपने चित्त के विश्लेषण से काम शक्ति का रूपान्तरण कर सकता है । रूपान्तरण का अर्थ है - सम्पुर्ण व्यक्तित्व मेँ उल्लास का समावेश हो जाना । दमन की अपेक्षा आकांक्षा एवं अभिरुचि का प्रवाह मोड़ने मेँ विशेष कठिनाई नहीँ उत्पन्न होती । ब्रह्मचर्य का वैज्ञानिक स्वरूय यही है - काम बीज का उन्नयन किया जाय , ज्ञानबीज मेँ परिवर्तित किया जाए । उसे ह्रास की ओर न ले जाकर विकास की ओर ले जाय । मनुष्य के मन मेँ वह अद्भुत शक्ति है कि वह पतन से बचकर उत्थान की ओर बढ़ सकता है । जब मनुष्य अपनी काम शक्ति का उपयोग साहित्य , संगीत , कला तथा अध्यात्म विकास मेँ करता है , तब मनोविज्ञान के पंडित इसे काम शक्ति का रूपांतरण कहते हैँ । अक्सर ऐसा देखा जाता है कि बहुत-से व्यक्ति अपना समस्त जीवन राष्ट्र सेवा एवं समाज सेवा मेँ लगा देते हैँ , जिसमेँ काम वासना की ओर सोचने का उन्हेँ कभी अवसर ही नहीँ मिलता । एक वैज्ञानिक जब अपने आपको विविध प्रकार के प्रयोगोँ मेँ तल्लीन कर देता है , तब भोग और विलास की ओर उसका ध्यान ही नहीँ जाता । एक कवी जब अपने काव्य रस मेँ आप्लावित हो जाता है , तब उसका ध्यान वासना की ओर जाता ही नहीँ । एक साहित्कार जब अपनी विविध कृतियोँ के लिखने मेँ संलग्न हो जाता है , तब उसके मन मेँ काम की स्फुरणा कैसे हो सकती है ? एक संत जब अपने चित्त की शक्ति को अपने ध्येय मेँ एकाग्र करके अध्यात्म साधना मेँ लीन हो जाता है , तब उसके उस निर्मल चित्त मेँ कामना एवं वासना की तरंग कैसे उत्पन्न हो सकती है ? इन उदाहरणोँ से यह बात स्पष्टरूपतः समझ मेँ आ जाती है कि चित्त की वृत्तियोँ को सब ओर से हटाकर जब मनुष्य उन्हेँ किसी एक विशुद्ध एवं उच्च ध्येय पर एकाग्र कर देता है , तब उस मनुष्य के मन मेँ कभी भी काम विकार , विकल्प एवं वासनामय बुरे विचार उत्पन्न नहीँ होने पाते । मनोवैज्ञानिक मनुष्य जीवन की इस स्थिती को काम शक्ति का रूपान्तर , काम शक्ति का ऊर्ध्वीकरण और काम शक्ती का संशोधन कहते हैँ । धर्मशास्त्र एवं नीतिशास्त्र मेँ मनुष्य जीवन की इस स्थिती को ही ब्रह्मचर्य कहा जाता है । एक दार्शनिक विद्वान ने "ब्रह्मचर्य" का व्यापक अर्थ करते हुए लिखा है कि अपने मन की बिखरी हुई शक्तियोँ को सब ओर से हटाकर किसी एक पवित्र बिन्दु पर केन्द्रित कर देना ही वास्तविक एवं सच्चा ब्रह्मचर्य है । इस ब्रह्मचर्य का श्रेष्ठतम उपयोग तो उसे सृजनात्मक दिशा देना ही हैँ । मानसिक शक्ति का शोधन उतना कठिन नहीँ है , जितना कि कुछ लोगोँ ने समझ रखा है । "शोधन" का अर्थ है - काम शक्ति को भोग विलास मेँ व्यय न करके उसे किसी उच्च कार्य मेँ लगाना । मनुष्य सभ्यता और संस्कृति के विकास के लिए , जहाँ अन्य अनेक प्रकार के कठोर परिश्रम करता है , वहाँ वह मानसिक "शोधन" के कार्य को भी भली भाँति कर सकता है । यह तो निश्चित है कि सभ्यता एवं संस्कृति का निर्माण काम भावना से संबंधित शक्ति रूपान्तर एवं शोधन से आसानी से हो जाता है । बिना इस प्रकार के रूपान्तर ( शोधन ) के मनुष्य अपने जीवन मेँ अपने किसी भी महान्‌ लक्ष्य की प्राप्ति नहीँ कर सकता । ब्रह्मचर्य से युक्त जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति मेँ आत्म सम्मान , जन कल्याण एवं समाज सेवा का भाव प्रबल रहता है और वह अपनी वीर्य शक्ति के समुचित प्रयोग से इन कठिनतर कार्योँ को सहज ही कर सकता है । इसलिए ब्रह्मचर्य का मुल्य है ; क्योँकि अगर ऊर्जा नीचे की तरफ बहती रहे , तो ऊपर की तरफ जाने को बचेगी क्या ? जब हम नदियोँ पर बाँध बाँध देते हैँ , तो वहाँ विराट्‌ विधुत्‌ को ऊर्जा इकट्ठी हो जाती है । ऐसे ही बाँध बाँध को बाँधने का उपाय है - ब्रह्मचर्य इस शक्ति का सदुपयोग न किया गया , तो वह मनुष्य को दुराचार एवं पापाचार की ओर ले जा सकती है । काम वासना के शोधित होने पर मनुष्य किसी भी एक उच्च कला का समुचित विकास कर सकता है । जैसे दीपक का तेल बत्ती के ऊपर चढ़ता हुआ प्रकाश मेँ बदल जाता है , वैसे ही जिस शक्ति की अधोमुखी गति है , यदि वह ऊपर की तरफ बहने लग पड़े अर्थात्‌ ऊर्ध्वरेतस्‌ ( ऊर्ध्वगामी ) बन जाये तो सब विषय वासनारूपी बल , ओजस्‌ , परमानंद मेँ बदल जाता है । कालिदास ने प्रयत्न और अभ्यास से इसे सिद्ध कर जड़ा बुद्धि से महाकवि बनने मेँ सफलता प्राप्त की थी ।

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