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सन्यास और ब्रह्मचर्य 1. सन्यास जीवन की परिभाषा : -

"सन्यास" का नाम सुनते ही किसी साधु-महात्मा को याद आती है । अवश्य ही पहुँचे हुए सन्त महापुरुषोँ का जीवन बहुत ही पवित्र और श्रेष्ठ होता है । ऐसे समर्थ महापुरुष तो पूर्ण ब्रह्मचारी होते ही है ; किन्तु आम तौर पर जो साधु होते हैँ , उनके जीवन मेँ तत्काल ही ब्रह्मचर्य की पूर्णता नहीँ आ जाती । उन्हेँ तो अपने जीवन की अशुद्धियोँ से काफी लड़ना पड़ता है । साधना के मार्ग पर अपना कदम सँभाल सँभाल कर रखना पड़ता है । केवल साधुत्व की प्रतिज्ञा मात्र से अथवा अविवाहित रहने से कोई सिद्ध , बुद्ध या मुक्त नहीँ हो जाता । यदि उसकी वासना को सभी बूँदे सूख गई , अन्तर्द्वन्द्व समाप्त हो गया और मन के विकारोँ की एक लम्बी लड़ाई मेँ वह जीत चुका है , तभी वह पूर्ण ब्रह्मचारी ( संन्यासी ) कहलाने योग्य होते है । संन्यासियोँ के लिए ब्रह्मचर्य जीवन एक महान्‌ प्रतिज्ञा है और जीवन भर उस प्रतिज्ञा के मार्ग पर चलता है और निरन्तर चलना है । परंतु साधक चलते-चलते कभी लड़खड़ा भी जाता है ; भटक भी जाता है ; क्योकि चिर-काल से संचित संस्कार को काफी दबाने का प्रयत्न करने पर भी कभी-कभी आंशिक रूप मेँ वह उभर जाता है और मन को गड़बड़ मेँ डाल देता है । अतः साधु के जीवन अपनाने के लिए अन्दर की तैयारी होनी चाहिए ; क्योँकि इस प्रकार के जीवन का विकास अंदर से होता है । यदि साधक की इस ओर की प्रर्याप्त तैयारी नहीँ है और अंतर मेँ वह ऊँचा नहीँ उठा है , केवल ऊपर से त्यागी का वेश बना लिया है , तो वह जीवन मेँ बुरी तरह पिछड़ जाएगा , दब जाएगा । उसका जीवन अंदर-ही-अंदर सड़ने-गलने लगेगा और एक दिन वह समाज के लिए और स्वयं अपने जीवन के लिए भी अभिशाप बनकर रह जाएगा । इसलिये जब कोई व्यक्ति संसार से निकलकर साधु-जीवन मेँ आना चाहता है , तो इससे पहले वे साधु-जीवन के महत्व को समझे ; उसके दायित्व को समझे , उस भार को उठाने के लिए अपने मेँ योग्य क्षमता का अनुभव करे , तब वह इस मार्ग पर कदम रखे । अन्यथा , पहले वह गृहस्थ-जीवन मेँ सुधरने का प्रयत्न करे । साधु-जीवन के योग्य बन जाय तब इस मार्ग पर आना चाहिए । जीवन के उत्थान की यही एक राह है - साधु-जीवन कि जो अति कठिन एवं अति तीक्षण मार्ग है । जैसे एक आदमी पैदल चलता है , दुसरा घोड़े-गाड़ी पर चलता है , तीसरा रेल से और चौथा हवाई जहाज से चलता है । चलते तो सभी हैँ मगर उनकी चाल क्रमशः तीव्र से तीव्रतर होती जाती है । मगर जिस क्रम से उनकी चाल तीव्र होती जाती है । उसी क्रम से उस मेँ खतरा भी अधिकाधिक बढ़ता जाता है । जरा-चूके , तनिक भी असावधानी हुई कि बस , फिर कहीँ के न रहे । फिर तो पतन का गहरा गर्क तैयार है । इसलिये यह साधु-मार्ग अति नाजुक भी है ।

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