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संन्यास और ब्रह्मचर्य 2. संन्यास और ब्रह्मचर्य मेँ घनिष्ठ संबंध : -

यही वजह है कि इस मार्ग पर चलने वाले अक्सर बड़े-बड़े योगी , ध्यानी व तपस्वी भी कभी-कभी विचलित हो जाते हैँ । इस प्रकार के एक नहीँ , अनेक उदाहरण प्राचीन ग्रन्थोँ मेँ आज भी उपलब्ध है ; किन्तु फिर भी साधक को हताश या निराश नहीँ होना चाहिए ; यथा : - "मारग चलते जो गिरे , ताको नाहीँ दोष । कह कबीर बैठा रहे , ताका है अफसोस ॥" - कबीर साहब चढ़नेवाला ही तो गिरता है ! अफसोस तो उसके लिये है , जो बैठा हुआ है । बैठा व्यक्ति तो गिरा हुआ ही है । इसलिये जो मनुष्य भूल कर सकता है , वह अपना सुधार भी कर सकता है । जो मनुष्य आज पतन के मार्ग पर चला है , वह कल उत्थान के मार्ग की ओर भी चल सकता है । जो मनुष्य आज दुर्बल है , कल वह सबल भी हो सकता है । श्री श्रीधर बाबा कहते थे - "योगी कितना भी भ्रष्ट क्योँ न हो , फिर भी वह आम आदमी से श्रेष्ठ है ।" अतः मत निराश होओ ! क्योँ साहस खोते हो ? बार-बार गिरने के पश्ताच्‌ भी पुनः सँभलकर चढ़ने का हौसला रखो । सुबह का भूला अगर शाम को घर वापस आ जाए , तो वह भूला नहीँ कहलाता । संयम करते-करते दृढ़ संकल्पवाला मनुष्य किसी न किसी दिन अखण्ड ब्रह्मचारी हो ही जाता है । नया बछड़ा बीसोँ बार गिरता और बीसोँ बार उठता है , तब कहीँ ठीक से खड़ा होना सीखता है । यद्यपि साधना मेँ अनेक बार गिरना और उठना पड़ता है , तब जाकर कहीँ सिद्धि मिलती है , तथापि एक अच्छे संन्यासी को तो ब्रह्मचर्य की साधना अत्यन्त निष्ठापूर्वक पालन करने की आज्ञा है । दरअसल ब्रह्मचर्य और संन्यास मेँ प्राचीनकाल से ही अत्यन्त गाढ़ संयोग है । आपस मेँ इन दोनोँ का एक-दूसरे के बिना कोई अस्तित्व नहीँ रह जाता है । ब्रह्मचर्य ही संन्यास की पृष्ठभूमि है । ब्रह्मचर्य हीन व्यक्ति को संन्यासी कहना कथमति उचित नहीँ और न किसी विषयी को अखण्ड ब्रह्मचारी कहना । तात्पर्य एक सच्चा साधु ही अखण्ड ब्रह्मचर्य पालन कर सकता है , और पूर्ण शान्त ब्रह्मचर्य ही संन्यास का नामकरण देता है ; संन्यास को निखारता है । ब्रह्मचर्य संन्यास को चमकाता है अवश्य ; परंतु इसके लिए संन्यासी को कठीन से कठीन नियमोँ को बड़ी सावधानी से जीवन मेँ पालन करना पड़ता है ।

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