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संन्यास और ब्रह्मचर्य 3. स्त्री-संगर्स सम्पुर्ण दोषोँ की जड़ - नारद ऋषि का जीवन उल्लेख - :

. इसलिये हे मित्रोँ ! इस कटाक्षरूपी विषाग्नि की धारण करनेवाले , स्वाभाव से ही भयंकर विलासरूपी फणवाले स्त्री रूपी सर्प दूर भागोँ । क्योँकि संसार-प्रसिद्ध सर्प से डँसे हुए लोग औषधि से अच्छे किया जा सकते है ; पर स्त्रीरूपी सर्प से डँसे हुए लोग अच्छे नहीँ किये जा सकते । देवर्षि नारद जी के संबंध मेँ कुछ ऐसी ही घटना है - भगवान्‌ विष्णु ने नारद को अपना भक्त जानकर उन्हेँ स्त्री से दूर रखा , अर्थात्‌ विवाह करने से रोका ; लेकिन मृगनयनी के वाण से घायड नारद को बहुत दु:ख हुआ । उन्होँने दूसरे जन्म मेँ वनवासी , विरहवन्त भगवान्‌ राम से पूछा कि प्रभु ! जब मैँ उस समय ( पूर्व जन्म मेँ ) विवाह करना चाहता था , तो आपने किस कारण से नहीँ करने दिया ? इसपर भगवान्‌ राम कहा - "नारद ! स्त्री के संयोग से काम , क्रोध , लोभ , मोह ,अहंकार ,डाह और ममता आदि बढ़ते हैँ तथा बुरी इच्छा और पाप की वृद्धि भी स्त्र के संयोग से ही होती है । स्त्री के संयोग से जब , तप और नेम कम जाते हैँ तथा बुद्ध , बल , शील और सत्य स्त्री के संयोग से नष्ट हो जाता है । स्त्री सम्पूर्ण दोषोँ की जड़ , पीड़ा देनेवाली और दुःखोँ की खान है । हे मुन नारद ! इस लिये अपने जी मेँ यह भलाई विचारकर आपको उस समय विवाह करने से रोका ।" संत कबीर साहब का वचन भी भगवान्‌ राम से मिलता-जुलता है । यथा , "नारी नसावे तीन गुण, जे नर पासै होय । भक्ति मुक्ति अरु ध्यान मेँ , पैठि सकै न कोय ॥" -संत कबीर यदि खाने के लिए कलपते हुए और दीन मुखवाले बच्चोँ से वस्त्रोँ द्वारा नोची-खसोटी गयी दुखिया अपनी गृहिणी न देखी जाय , तो कौन ऐसा स्वाभिमानी पुरुष होगा , जो इस जले पेट के लिए याचना के व्यर्थ होने के भय से और रुँधे हुए गले के कारण अस्पष्ट शब्दोँ से "मुझे दो" , ऐसा कहने के लिए तैयार होगा ! अर्थात्‌ इन सब अनर्थोँ की मूल स्त्री है । इसलिये भगवान बुद्ध ने कहा - "बुद्धिमान्‌ मनुष्य को चाहिये कि वह विवाह न करे । विवाहित जीवन एक प्रकार का दहकते हुए अंगारोँ से भरा हुआ खड्डा समझे ।" ईशा मसीह का कथन - "अविवाहित जीवन ईश्वर प्यार करता है । संयम और पवित्रता से रहना आदेश ।" "विवेक-चूड़ामणि" मेँ तो पुरुष के लिये स्त्री अति कठिन बन्धन कहा गया है , यथा "नरस्य बन्धनार्थाय श्रृंखला स्त्री प्रकीर्त्तिता । लोहबद्धोअपि मुच्यते स्त्रीबद्धो नैव मुच्यते ॥ अर्थात्‌ "पुरुष के बन्धन का हेतु स्त्री ही बड़ी रूप मेँ है । लोहे की बेड़ी से बाँधा हुआ पुरुष छूट जाता है ; परंतु स्त्री के स्नेहरूपी पाश करके बँधा हुआ कदापि छुट नहीँ सकता ।" संयोग या संसर्ग से इन्दिरयजनित ज्ञान की उत्पत्ति होती है । इन्द्रियजनित ज्ञान से तत्संबंधी सुख को प्राप्त करने की अभीलाषा दृढ़ होती है । संसर्ग से दूर रहने पर जीवात्मा सब प्रकार के पापमय जीवन से मुक्त रहता है । अतः ब्रह्मचर्य परायण साधक को चाहिए कि वह मन मेँ अनुराग उत्पन्न करनेवाली तथा विषय वासनादि की वृद्धि करनेवाली स्त्री कथा , स्त्रियोँ के परिचय और उनके साथ बैठकर बार-बार वार्तालाप करने के अवसरो को सदा के लिए परित्याग कर देँ । जैसे अग्नि के पास रहने से लाख ( लाह )का घड़ा पिघल जाता है , वैसे ही विद्वान पुरुष भी स्त्री के सहवास मेँ विषाद को प्राप्त होता है अर्थात्‌ उसका मन संक्षुब्ध हो जाता है ।

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