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संन्यास और ब्रह्मचर्य 4. आक्षप-निराकरण : -

इस संबंध मेँ कुछ लोगोँ का आक्षेप है कि संन्यासी लोग नारी को नरक का द्वार क्योँ कहते हैँ ? तर्क तो ठीक है ; क्योँकि नारी ही जन्म देती है पुरुष को , तो नारी की निंदा क्योँ ? परंतु इस संदर्भ मेँ एक बात ध्यान रखनेयोग्य है कि इस आक्षेप की आड़ मेँ कहीँ आप नारी के आकर्षण मेँ तो नहीँ पड़ रहे हैं ? इस कथन के पीछे नारी के प्रति शास्त्रकारोँ का या सन्यासियोँ का कोई दुर्भाव नहीँ है ; बल्कि भाव यह है कि नारी के प्रति यदि दृष्टि ठीक नहीँ रहीँ , तो वह आपके लिये नरक का द्वार खोल देगी । भीतर से हर कोई इतना सशक्त तो है नहीँ कि नारी पर नजर पड़ते ही माँ या बहन का भाव उठेगा ही , भोग को नहीँ उठेगा । अतएव स्त्री के सानिन्ध्य और आकर्षण मेँ बह जाए और पतन न हो जाए , इस हेतु सचेत करने के लिए शास्त्रकारोँ ने नारी-आकर्षण की निँदा की है । नारी के क्षण भर का आकर्षण किस तरह मनुष्य को गड्ढ़े मेँ गिरा देता है , यह एक युवक संन्यासी के जीवन की घटना से पता चलता है - एक युवक संन्यासी , जो बचपन से ही जंगल मेँ गुरु के आश्रम मेँ रहा था । और जिसे संसार का कुछ भी ज्ञान नहीँ था ,पहली ही बार वह यात्रा पर निकला । उसने एक बारात देखी , तो लोगोँ से पुछा - यह क्या है ? लोगोँ ने बताया कि यह घोड़े पर सवार लड़का लड़की को लेकर अपने घर आएगा और घर मेँ दोनोँ साथ-साथ एक ही विस्तर पर सोएँगे , आदि-आदि । परंतु संन्यासी ठीक तरह से कुछ समझ नहीँ पाया । उस लड़के और लड़की के चिन्तन मेँ मग्न वह संन्यासी आगे जाकर एक कुँए की जगत पर थका हुआ होने के कारण लेट गया । थोड़ी ही देर मेँ उसे नीँद आ गई । निँद्रावस्था मेँ उसने स्वपन मेँ देखा कि वह स्वयं उसे दुल्हे मेँ सोयी लड़की ने कहा - थोड़ा सरको ! वह सरका । लड़की ने फिर कहा - थोड़ा और सरको । ऐसा 2-3 बार कहा , तो वह संन्यासी कुँए की जगत पर सोया-सोया ही सरकता गया और कुएँ मेँ गिर पड़ा । कुएँ मेँ किसी के गिरने की आवाज सुनकर रास्ते चलते कुछ लोग दौड़े हुए वहाँ आए और रस्सा लटकाकर उसको बाहर निकाला । लोगोँ ने पूछा - कुएँ मेँ कैसे गिर पड़े ? संन्यासी ने देखी हुई बारात की और अपने स्वपन की सारी बातेँ बताते हुए कहा - "जब नाम मात्र-संसर्ग से सपने मेँ स्त्री ने मुझे कुएँ मेँ गिरा दिया , तो सचमुच वह स्त्री वर राजा को कहाँ पहुँचाएगी - परमात्मा ही जाने ।"

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