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संन्यास और ब्रह्मचर्य 5. नारी को भी ब्रह्मचर्य की आवश्यकता : -

इस ब्रह्मचारी का उद्धार करनेवाली शैलबाला स्त्री ही थी । अतः स्त्रियोँ को भी ब्रह्मचर्य-व्रत पालन करना चाहिए । वे भी मीराबाई की भाँति नैष्ठिक ब्रह्मचारिणियाँ रहकर अपने-आपको भगवान्‌ की सेवा व भक्ति मेँ अर्पित कर सकती हैँ । स्वयंप्रभा ने इसी ब्रह्मचर्य-बल से एक क्षण मेँ सीताजी का पता लगाकर हनुमानजी को बता दिया था । मदालसा , पद्यावती , सावित्र शन्‌री और सुलभा तथा अनसूया , शाण्डिली आदि स्त्रियाँ इसी ब्रह्मचर्य को अपने जीवन मेँ धारण करके तो अमर हुई । अतएव जीवन के चरमोद्देश्य की सिद्धि व अपने कल्याण की प्राप्ति के लिए स्त्रियोँ को भी ब्रह्मचारिणी रहना अत्यावश्यक है । यदि घर मेँ पुत्री , बहु या कोई नारी ब्रह्मचारिणी है , तो समझना चाहिए कि घर मेँ एक देवी निवास करती है । घरवालोँ को उसे आदर की दृष्टि से देखना चाहिए । उसके शरीर निर्वाह की पूरी व्यवस्था करनी चाहिए । उसे किसी प्रकार की असुविधा न हो , यह ध्यान रखना चाहिए । जो इस दुर्जय काम को मार डालती है , जो अपने जीवन को ब्रह्मचर्य-तप मेँ तवाकर शुद्ध बना रही है , ऐसी महान्‌ देवी ब्रह्मचारिणी घरवालोँ की श्रद्धेया तथा आदरणीया है । ऐसी देवी से घरवालोँ का भी सुधार होता है । घरवालोँ को यह जानकार प्रसन्न रहना चाहिए कि हमारे घर मेँ एक तपःपूत देवी निवास करती है , जिसके प्रभाव से हमारा घर मंगलमय रहेगा । ब्रह्मचारिणी नारी के लिए स्वतंत्र विचरण करना हितकर नहीँ है । अतएव नैहर ( मायके ) या ससुराल तथा जहाँ उपयुक्त हो आश्रम बनाकर एक स्थान पर रहना श्रेष्टकर है । यहाँ एक बात और ध्यान रखना अत्यन्त उपयुक्त होगा कि जिस तरह पुरुष साधक के लिए स्त्री-संसर्ग व संपर्क आदि वर्जित है , उसी तरह स्त्री साधिका के लिए भी पुरुष संसर्ग व संपर्क आदि वर्जित है । जितना हानिकारक स्त्री पुरुष के ब्रह्मचर्य को खण्डित करने मेँ सिद्ध है , उतना ही पुरुष भी स्त्री के ब्रह्मचर्य खण्डन मेँ उग्र है । अतएव स्त्री साधिका को चाहिए कि वह भी पुरुष संसर्ग व संपर्क से बिल्कुल अलग रहे । पुरुषोँ के आसक्ति जाल से बचने के लिए उनके दोषोँ को सदैव याद रखेँ । काश ! अगर स्त्रियाँ ब्रह्मचारिणी रहकर , इस मन को क्षुब्ध करनेवाले पुरुष मिलाप के क्षणिक सुख की तिलाञ्जली कर देँ , तो उन्हेँ उस महान्‌ प्रसव-पीड़ा को न झेलना पड़े , जो मौत के समान अत्यन्त भयंकर व शरीर को बना देनेवाली होती है । पुरुष ही सबसे बुरा अपराधी होता है , वही वास्तविक बहकानेवाला होता है । वह आक्रमक तथा अतिक्रामक भी है । वही सर्वप्रथम "वर्जित फल" का आस्वादन करता है , वह सक्रिय होता है । कामाधीन होने पर वह अपनी बुद्धि , विवेक तथा समझ तक को खो बैठता है । पुरुष काम के अधीन होकर स्त्री को गर्भ धारण करने के दुःख मेँ डाल देता है । यदि पुरुष की ऐसी परम नीच प्रकृति न होती , तो सभी स्त्रियाँ - मीरा , मदालसा , सुलभा तथा वृन्दा , शाण्डिली व शवरी होती । पुरुषोँ मेँ स्त्रियोँ की अपेक्षा बहुत ही कम आत्म-संयम होता है । यह उनकी कमजोरी है । यद्यपि वे शरीर तथा बुद्धि की दृष्टि से स्त्री की अपेक्षा अधीक शक्तिशाली क्योँ न होँ , इन पुरुषोँ के साथ ही तो मुक्त रूप से संसर्ग रखने से स्त्रियाँ अपनी , शालीनता , नारी-शुलम-लालित्य तथा अपने शरीर और चरित्र की पवित्रता ता भी खो बैठती है । अतएव खासकर ब्रह्मचारिणी स्त्रियोँ को पुरुष का स्पर्श तो दूर , उनसे बात-करना व उनकी ओर देखना तक भी उपयुक्त नहीँ । यहाँ , आचार्य स्वामि गरीब दास जी ने बड़े अच्छे शब्दोँ मेँ स्पष्ट रूप से समझाया है ब्रह्मचारिणियोँ को ; यथा - "गरीब कामी कमंध न चढ़ै , ह्रदय जाका चोर । जाकी और न देखिये , जाका ह्रदय कठोर ॥" नारियोँ को अपनी कल्याण साधना मेँ वेग भरने के लिए आदर्श नारियोँ के जिस किसी एक ही दो अंशोँ मेँ उनके उत्तम गुण होँ , उनका पर्यन्त अपने सतीत्व की पूर्ण रूप से रक्षा की । झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई अपने सतीत्व और स्वाधीनता की रक्षा के लिए स्वयं तलवार लेकर अंग्रेजोँ से लड़ती हुई वीरगति को प्राप्त हुई । राजघराने की बहू मीराबाई को घरवालोँ द्वारा अनेक दुःख दिये गये , ताड़ना दी गयी , विष दिया गया ; परंतु उन्होँने सत्यसंग , रैदास-जैसे गुरु की भक्ति तथा साधना को नहीँ छोड़ा । चित्तोड़ की रानी पद्मिनी ने सैकड़ोँ नारियोँ-सहित आग मेँ कूदकर जान दे दी ; परंतु दुराचारियोँ की अपनी शरीर नहीँ दिये । उपर्युक्त प्रकार से ब्रह्मचारिणी नारियोँ को निश्चय करना चाहिए कि हम अपने को जोखिम मेँ न डालकर भी , मृत्यु का वरण करके भी ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करेँगी । ब्रह्मचारिणी को अपने ब्रह्मचर्य का रक्षण सब प्रकार से करना चाहिए । संसार के सारे ऐश्वर्योँ का प्रलोभन भी ब्रह्मचर्य को तिलमात्र भी न डिगा ( विचलित कर ) सके । ऐसा दृढ़निश्चयी होना चाहिए उसे । भगवान महावीर ने क्या ही सुन्दर कहा है - "जलती आग मेँ प्रवेश करना अच्छा है ; पर अंगीकृत शीलव्रत ( ब्रह्मचर्य ) को तोड़ना अच्छा नहीँ है । संयम ( ब्रह्मचर्य ) मेँ रहते मृत्यु भी अच्छी , पर शील रहित ( ब्रह्मचर्य ) होकर जीना अच्छा नहीँ ।" जो संन्यास लेकर भी अब्रह्मचर्य रहता है , ऐसे तथाकथित संन्यासियोँ को भक्त कबीर ने ठग की संज्ञा दी है ;यथा - "गृही होकर कथे ज्ञान , अमली होकर धरे ध्यान । साधु होकर कूटे भग , कहै कबीर ये तीनोँ ठग ॥" और हमारे धर्मशास्त्र मेँ तो बड़े ठोस शब्दोँ मेँ लिका है जो कि संन्यासी होकर फिर स्त्री के साथ मैथुन करता है , अथवा स्त्री संन्यासिनी बनकर पुरुष-सहवास करे तो ऐसे जघन्य अपराधी मनुष्य साठ हजार वर्ष विष्ठा मेँ कृमि योनी को प्राप्त होते है ; यथा - "यस्तु प्रव्रजितो भूत्वा पुनः सेवितः मैथुनम्‌ । षष्टि वर्ष सहस्त्राणि विष्ठायां जायते कृमिः ॥"

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