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ब्रह्मचर्य तथा इन्द्रिय संयम 1. नेत्र संयम (Celibacy and abstinence sense) 1.Eye restraint

नेत्र संयम (Eye restraint)

नेत्र संयम ब्रह्मचर्य पालन का प्रथम सोपान है । "नेत्र-संयम" का अर्थ है - नेत्र से सुन्दर और आकर्षण वस्तु देखकर भी उस वस्तु मेँ आसक्ति और लालसा उत्पन्न न होने देना । मनुष्य के मन मेँ प्रसुप्त विकार और वासना को जागृत करने के लिए नेत्र सबसे बलवती इन्द्रिय है । रूप को देखना इसका मुख्य कार्य है । रूप कैसा भी क्योँ न हो , उसे देखने की लालसा प्रायः प्रत्येक मनुष्य के मन मेँ बनी रहती है । रूप-दर्शन की इस लालसा और आसक्ति को जीतना ही नेत्र-संयम है । यह नेत्र का ब्रह्मचर्य है । मनुष्य की वासना किसी भी सौँन्दर्य को देखते के पश्चात्‌ भोग मेँ परिणत हो जाती है । इस नेत्र-वासना ने बड़े-बडोँ को विकार की खाई मेँ गिरा दिया है । नेत्र-वासना ने केवल पतिँगोँ को ही भस्म नहीँ किया , वरन्‌ बड़े-बड़ोँ विद्वानोँ , योगियोँ और सदाचारियोँ को भी पतन के गड्ढे मेँ ढकेलकर सर्वनाश तक पहुँचा दिया है । अतः इसपर विजय प्राप्त करने के लिए अपने नेत्र की इस प्रवृति पर नियंत्रण करने की अत्यन्त आवश्यकता है । आप ब्रह्मचर्य की साधना कर लेँ , किँतु आँखोँ पर अंकुश न रखेँ , बुरे-बुरे दृश्य देखा करेँ , तो क्या लाभ ? उधर आँखोँ मेँ जहर भरता रहे तथा संसार के रंगीन दृश्योँ का मजा लेता रहे और इधर ब्रह्मचर्य को सुरक्षित रखने का मंसुबा भी किया जाए , यह कैसे सम्भव है ? जब किसी मोहक छवी पर दृष्टि परे तो तुरंत अपने ईश्वर पर मन को रुकाये । अगर कोई मोहक स्त्री आपसे बात करने आये तो उसका चेहरा न देखकर अपने ईश्वर को बाहरी ध्यान करके वार्त्तालाप करेँ । "प्रथम चक्षु इन्द्री कहं साधे । गुरु गम पंथ नाम अवराधे ॥ अर्थात्‌ सद्गुरु कबीर साहेब समझाते हुए कहते हैँ कि साधना के क्षेत्र मेँ साधु सबसे पहले आंख-इंद्री को साधे , वह कहीँ चलायमान न हो , किसी विषय पर अटके-भटके नहीँ , उसे भली-भाँति अपने वश मेँ करे और गुरु-ज्ञान के मार्ग पर चलता हुआ सदैव ईश्वर का सुमिरन करे । सुन्दर रूप चक्षु की पूजा । रूप कुरूप न भावे दूजा ॥ रूप कुरूपहि सम कर जाने । दरस विदेह सदा सुख माने ॥ सुंदर रूप देखने मेँ आँखोँ को प्रिय लगता है , इसीलिए सुंदर रूप को आँख की पूजा कहा गया है और जो दूसरा रूप कुरूप है वह देखने मेँ नहीँ भाता , अतः उसे कोई देखना नही चाहता । साधु को चाहिए कि वह नाशवान देह के सुंदर रूप एवं कुरूप को एक समान समझे और स्थुल-दृष्टि से ऊपर उठकर अंतर्दृष्टि से देह के भीतर जो विदेह रूप अविनाशी शाश्वत एवं चेतन सत्यात्मा विद्यमान है , उसके दर्शन से सुख माने , अर्थात्‌ सब देहोँ के भीतर समान आत्मा जानकर प्रेम भाव से सबका सम्मान करे ।

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