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ब्रह्मचर्य तथा इन्द्रिय संयम 2. श्रोत यानी श्रवण संयम Celibacy and abstinence sense 2. The auditory source control

श्रोत यानी श्रवण संयम The auditory source control

मनुष्य के पास दूसरी प्रमुख इन्द्रिय श्रोत ( काम ) है । श्रोत इन्द्रिय का विषय है शब्द । शब्द प्रिय भी होता है और अप्रिय भी होता है । प्रिय शब्द को सुनकर मनुष्य के मन मेँ राग उत्पन्न होता है और अप्रिय शब्द को सुनकर द्वेष । किन्तु कामोत्तेजक अभद्र शब्द मनुष्य के मन मेँ प्रसुप्त वासना की जागृत कर देता है । अतः ब्रह्मचर्य को अपने कान को हमेशा पवित्र रखना चाहिए । वह जब भी सुने , और पवित्र शब्द ही सुने , और जब कभी प्रसंग आए , तो पवित्र शब्द ही सुनने को तैयार रहे । गन्दी बातोँ का डटकर विरोध करना चाहिए । मन के भीतर और समाज के प्रांगण मेँ भी । जो कोई अपनी श्रवणेन्द्रिय को काबू मेँ रखेगा , वही अपनी वागिन्द्रिय अर्थात्‌ मुख को भी काबू मेँ रख सकता है । कान का मुँह से बड़ा संबंध है । हम कान से जो शब्द सुनते हैँ , मुख से उसी का उच्चारण करते है । जैसे भोजपुरी सेक्सी तथा हिन्दी आदि धुन के गानेँ को सुनकर आजकल के लड़के एवं नवयुवकोँ वे भी गाने लगते है । यह श्रोत्रेँद्रिय काम हमेशा शुभ वचन सुनना चाहती है इसके द्वारा कठोर वचन सुनकर क्रोधाग्नि से चित्त दहकने लगता है , जिससे घोर अशांति हो जाती है । साधु को चाहिए कि वह बोल-कुबोल अर्थात्‌ मीठे तथा कडुवे दोनोँ प्रकार के बोल वचनोँ को सम्मान भाव से सह ले और खराब बचनोँ को सहकर उसे भुला जाए या उसे अपने वाणी के द्वारा बाहर न आने दे ।

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