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मन क्या है ?

"मन" का रूप निरंजन अर्थात्‌ काल जो दुनियाँ मेँ सभी का स्वामी है । परंतु आत्मा का स्वामी नहीँ है । मन हमेशा गलत कार्य कराता , यौन , क्रोध , लोभ , ममता , अहंकार , तृष्णा , ईर्ष्या , जलन , हिँसा , मुर्दा खाना , आदि हमेँ मन के अधीन नहीँ रहना चाहिये । क्योँकि मन आपको पगला देगा । यहाँ पर आप दया , संतोष , धीरज तथा विचार के साथ कर्त्तव्य करना है । मांसाहारी बनकर जीना अपने ऊपर कलंक है इसलिए सत्य पर चले दो दिन का जिन्दगी मेँ गलत काम छोड़कर अच्छे कर्म करेँगे तो क्या होगा ? कुछ नहीँ ।

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